हर झूठी हेडलाइन के पीछे एक मजबूर पत्रकार और हर चुप्पी के पीछे एक डरा हुआ ज़मीर छिपा होता है।
मजबूरी ऑफ़ गोदी मीडिया प्रोफेशनल्स
कलम ने आईने से पूछा,
"क्या सचमुच मैं ज़िंदा हूँ?"
आईना चुप रहा,
उसकी ख़ामोशी में
हज़ार न्यूज़रूम रोते रहे।
कैमरे की आँखें सब देखती हैं,
पर स्क्रीन पर
वही उतरता है
जिसे मालिक की उँगलियाँ
इशारों से लिखती हैं।
जिसने सीखा था
सत्ता से सवाल करना,
आज वही
सवालों की लाश पर
ब्रेकिंग न्यूज़ सजाता है।
उसकी जेब में
बच्चे की फीस रखी है,
माँ की दवाइयाँ रखी हैं,
बूढ़े पिता की खाँसी,
और किराए के घर का
आख़िरी नोटिस रखा है।
कैसे कह दे सच?
रोटी का स्वाद
अक्सर ज़मीर की कड़वाहट
निगल जाता है।
भीड़ जब लोकतंत्र के लिए
आवाज़ उठाती है,
वह भी सुनता है।
पर उसके कानों में
दफ़्तर की एक आवाज़
और ज़्यादा ऊँची होती है—
"मुद्दा नहीं, नैरेटिव दिखाओ...
चेहरे नहीं, दुश्मन तलाशो...
सवाल नहीं, सनसनी बेचो..."
वह जानता है,
झूठ की उम्र
सुर्ख़ियों जितनी होती है,
लेकिन नौकरी की भूख
हर सुबह नई हो जाती है।
इसलिए
उसकी मुस्कान में
एक अदृश्य माफ़ीनामा रहता है,
जिसे कोई पढ़ नहीं पाता।
वह भीड़ से नहीं,
खुद से नज़रें चुराता है।
हर शाम
स्टूडियो की तेज़ रोशनियों में
उसके भीतर का पत्रकार
थोड़ा और अँधेरा हो जाता है।
फिर भी...
राख के नीचे
एक चिंगारी बची रहती है।
उसे यक़ीन है,
एक दिन
माइक्रोफ़ोन फिर
जनता की धड़कन सुनेगा,
कैमरा फिर
सच की तरफ़ मुड़ेगा,
और कलम
किसी सत्ता की नहीं,
संविधान की भाषा लिखेगी।
उस दिन
समाचार नहीं बिकेंगे,
सवाल नहीं डरेंगे,
और पत्रकार
रोटी भी कमाएगा,
ज़मीर भी बचाएगा।
क्योंकि
सबसे बड़ी त्रासदी
यह नहीं कि झूठ बोला गया,
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि
सच बोलने वाले होंठों को
पहले भूखा बनाया गया।
और भूख...
अक्सर सबसे पहले
आवाज़ खरीदती है।
-गौतम झा
मजबूरी ऑफ़ गोदी मीडिया प्रोफेशनल्स
कलम ने आईने से पूछा,
"क्या सचमुच मैं ज़िंदा हूँ?"
आईना चुप रहा,
उसकी ख़ामोशी में
हज़ार न्यूज़रूम रोते रहे।
कैमरे की आँखें सब देखती हैं,
पर स्क्रीन पर
वही उतरता है
जिसे मालिक की उँगलियाँ
इशारों से लिखती हैं।
जिसने सीखा था
सत्ता से सवाल करना,
आज वही
सवालों की लाश पर
ब्रेकिंग न्यूज़ सजाता है।
उसकी जेब में
बच्चे की फीस रखी है,
माँ की दवाइयाँ रखी हैं,
बूढ़े पिता की खाँसी,
और किराए के घर का
आख़िरी नोटिस रखा है।
कैसे कह दे सच?
रोटी का स्वाद
अक्सर ज़मीर की कड़वाहट
निगल जाता है।
भीड़ जब लोकतंत्र के लिए
आवाज़ उठाती है,
वह भी सुनता है।
पर उसके कानों में
दफ़्तर की एक आवाज़
और ज़्यादा ऊँची होती है—
"मुद्दा नहीं, नैरेटिव दिखाओ...
चेहरे नहीं, दुश्मन तलाशो...
सवाल नहीं, सनसनी बेचो..."
वह जानता है,
झूठ की उम्र
सुर्ख़ियों जितनी होती है,
लेकिन नौकरी की भूख
हर सुबह नई हो जाती है।
इसलिए
उसकी मुस्कान में
एक अदृश्य माफ़ीनामा रहता है,
जिसे कोई पढ़ नहीं पाता।
वह भीड़ से नहीं,
खुद से नज़रें चुराता है।
हर शाम
स्टूडियो की तेज़ रोशनियों में
उसके भीतर का पत्रकार
थोड़ा और अँधेरा हो जाता है।
फिर भी...
राख के नीचे
एक चिंगारी बची रहती है।
उसे यक़ीन है,
एक दिन
माइक्रोफ़ोन फिर
जनता की धड़कन सुनेगा,
कैमरा फिर
सच की तरफ़ मुड़ेगा,
और कलम
किसी सत्ता की नहीं,
संविधान की भाषा लिखेगी।
उस दिन
समाचार नहीं बिकेंगे,
सवाल नहीं डरेंगे,
और पत्रकार
रोटी भी कमाएगा,
ज़मीर भी बचाएगा।
क्योंकि
सबसे बड़ी त्रासदी
यह नहीं कि झूठ बोला गया,
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि
सच बोलने वाले होंठों को
पहले भूखा बनाया गया।
और भूख...
अक्सर सबसे पहले
आवाज़ खरीदती है।
-गौतम झा
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