कुछ रिश्ते नाम से नहीं, एहसास से पहचाने जाते हैं। यह कविता उसी अनकहे ताल्लुक की कहानी है, जो शब्दों से नहीं, ख़ामोशियों से ज़िंदा रहता है।
ताल्लुक
वह जो बिन कहे सुन लेता है,
खामोशी के पन्नों पर लिखी दास्तान।
धूप में साया-सा लगता है,
वो यार, वो साथी, वो दोस्त है मेरा।
दराज़ में रखी उस पुरानी घड़ी की तरह,
जो बंद होकर भी ठहरे वक़्त का पता देती है।
उम्र के किसी अनजाने मोड़ पर जब थककर बैठूँ,
हथेली पर चुपके से गरम चाय टिका देती है।
न कोई शर्त का काग़ज़, न ताल्लुक का हिसाब,
बस एक शाम का टुकड़ा है, जो साथ बाँट लिया।
सफ़र की गर्द में धुंधली पड़ी थीं जो राहें,
एक हल्की-सी मुस्कान ने उनका सिरा थाम लिया।
सर्द रातों में भीगी हुई लकड़ी-सा जलना,
और बेआवाज़ धुएँ में पुरानी यादें बुनना।
कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते,
बस उम्रभर की ख़ामोश मौजूदगी बन जाते हैं।
वह जो बिन कहे सुन लेता है,
वो यार, वो साथी, वो दोस्त है मेरा।
-गौतम झा
ताल्लुक
वह जो बिन कहे सुन लेता है,
खामोशी के पन्नों पर लिखी दास्तान।
धूप में साया-सा लगता है,
वो यार, वो साथी, वो दोस्त है मेरा।
दराज़ में रखी उस पुरानी घड़ी की तरह,
जो बंद होकर भी ठहरे वक़्त का पता देती है।
उम्र के किसी अनजाने मोड़ पर जब थककर बैठूँ,
हथेली पर चुपके से गरम चाय टिका देती है।
न कोई शर्त का काग़ज़, न ताल्लुक का हिसाब,
बस एक शाम का टुकड़ा है, जो साथ बाँट लिया।
सफ़र की गर्द में धुंधली पड़ी थीं जो राहें,
एक हल्की-सी मुस्कान ने उनका सिरा थाम लिया।
सर्द रातों में भीगी हुई लकड़ी-सा जलना,
और बेआवाज़ धुएँ में पुरानी यादें बुनना।
कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते,
बस उम्रभर की ख़ामोश मौजूदगी बन जाते हैं।
वह जो बिन कहे सुन लेता है,
वो यार, वो साथी, वो दोस्त है मेरा।
-गौतम झा
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