चालीस की उम्र में प्रेम, परिपक्वता और मुलाक़ात

चालीस की उम्र में प्रेम, परिपक्वता और मुलाक़ात

हर प्रेम कहानी जवानी में नहीं लिखी जाती। कुछ मुलाक़ातें चालीस की उम्र में होती हैं, जहाँ प्रेम परिपक्वता में बदल जाता है और रिश्ते आत्मा का संवाद बन जाते हैं।

मुलाक़ात

उम्र की चालीसवीं सीढ़ी पर आकर,
एक ख़ामोश सा ठहराव मिलता है।
जहाँ शोर दफ़न हो जाता है ख़्वाहिशों का,
और रूह को रूह का पता मिलता है।

वह पहली जवानी की उतावली धूप थी,
वादों के वे कच्चे मकान थे।
तुम मिले तो लगा जैसे मुद्दतों बाद,
दो थके हुए परिंदे अपने आसमान में थे।

तेरी आँखों में कोई हड़बड़ाहट नहीं थी,
मुझे ख़ुद को साबित करने का कोई गुमान था,
जैसे ढलती हुई शाम के आँचल में,
किसी पुरानी धुन का एक बयाँ था।

गुलज़ार के किसी मिसरे-सी महक उठी,
यह ज़िंदगी जो अब तक महज़ एक सफ़र थी।
रूमी के चिराग़-सा दिल फिर जल उठा,
जब तेरी सादगी ही मेरी मुकम्मल नज़र थी।

बहते पानी को रोकने की ज़िद है,
समंदर को अपने में समेटने की प्यास।
रवींद्र के किसी गीत-सी बहती है हवा अब,
बस तेरे होने का एहसास ही सबसे ख़ास।

चालीस के इस मोड़ पर तुमसे मिलना,
जैसे सूखे हुए फूल में फिर से रंग जाना।
यह राब्ता अब जुनून नहीं, एक इबादत है,
और उस इबादत में... मेरा तेरा हो जाना।

-गौतम झा

 

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