जब जी.डी.पी. बढ़ती है, तो क्या आम आदमी का बोझ भी कम होता है?
डिजिटल शोर
कंधे पर भारी टोकरी,
उसमें समाया “जी.डी.पी.”,
उफनती साँसें, काँपते पाँव,
और ढलान भरी यह राह नई।
पीठ पर बैठा शहनशाह,
हाथों में छलकता जाम है,
मजबूर किसान का पसीना ही,
क्या तरक्की का नाम है?
सामने हैं पत्थरों के ढेर,
जो राह रोककर खड़े हैं,
महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार के,
चट्टान जैसे संकट बड़े हैं।
हर कदम पर एक नया वार है,
जीवन की ऐसी हार है,
पर सोशल मीडिया की दुनिया में,
बस आँकड़ों की बहार है।
फ़ीड पर ट्रेंड करता हैशटैग,
“डिजिटल भारत” का शोर है,
रील और ट्वीट्स की जगमगाहट में,
छुपा अँधेरा घोर है।
कमेंट्स में चलती बहसें,
लाइक की होड़ पुरानी है,
पर इस टूटे हुए इंसान की,
कौन लिखता कहानी है?
ग्राफ़ में जो ऊपर जाता,
वह देश का विकास है,
पर ज़मीनी हक़ीक़त में,
बची केवल निराशा-आस है।
वायरल कार्टून सा बनकर,
रह गई यह लाचारी,
जी.डी.पी. का बोझ उठाए,
रोती आम जनता बेचारी।
-गौतम झा
डिजिटल शोर
कंधे पर भारी टोकरी,
उसमें समाया “जी.डी.पी.”,
उफनती साँसें, काँपते पाँव,
और ढलान भरी यह राह नई।
पीठ पर बैठा शहनशाह,
हाथों में छलकता जाम है,
मजबूर किसान का पसीना ही,
क्या तरक्की का नाम है?
सामने हैं पत्थरों के ढेर,
जो राह रोककर खड़े हैं,
महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार के,
चट्टान जैसे संकट बड़े हैं।
हर कदम पर एक नया वार है,
जीवन की ऐसी हार है,
पर सोशल मीडिया की दुनिया में,
बस आँकड़ों की बहार है।
फ़ीड पर ट्रेंड करता हैशटैग,
“डिजिटल भारत” का शोर है,
रील और ट्वीट्स की जगमगाहट में,
छुपा अँधेरा घोर है।
कमेंट्स में चलती बहसें,
लाइक की होड़ पुरानी है,
पर इस टूटे हुए इंसान की,
कौन लिखता कहानी है?
ग्राफ़ में जो ऊपर जाता,
वह देश का विकास है,
पर ज़मीनी हक़ीक़त में,
बची केवल निराशा-आस है।
वायरल कार्टून सा बनकर,
रह गई यह लाचारी,
जी.डी.पी. का बोझ उठाए,
रोती आम जनता बेचारी।
-गौतम झा
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