गुरु पूर्णिमा: चाँद ने आज दीपक से सीख ली

गुरु पूर्णिमा: चाँद ने आज दीपक से सीख ली

क्या गुरु केवल ज्ञान देता है, या आत्मा के भीतर छिपे प्रकाश का द्वार भी खोलता है?

गुरु पूर्णिमा

आज चाँद पूरा है,
पर उजाला उसका अपना नहीं।
वह भी किसी अदृश्य गुरु की
उँगली पकड़कर
अँधेरे की वर्णमाला पढ़ता है।

गुरु वह नहीं
जो केवल श्लोकों का अर्थ बताए,
गुरु वह है
जो मौन के भीतर छिपे
अनकहे प्रश्नों की धड़कन सुनना सिखा दे।

किताबें अक्षर देती हैं,
गुरु दृष्टि देता है।
रास्ते पाँवों से तय होते हैं,
पर मंज़िल तक पहुँचने का साहस
किसी गुरु की आँखों में जन्म लेता है।

जिसने अहंकार की दीवार पर
एक छोटी-सी खिड़की खोल दी,
जिसने हार को
अगले प्रयास की प्रस्तावना बना दिया,
जिसने आँसू को
कमज़ोरी नहीं, संवेदना का प्रमाण कहा,
वही गुरु है।

हर गुरु
विद्यालय की चौखट पर नहीं मिलता।
कभी माँ की हथेली में,
कभी पिता की चुप्पी में,
कभी किसी किसान के पसीने में,
कभी मज़दूर के फटे हुए हाथों में,
तो कभी अपनी ही भूलों के आईने में
एक गुरु बैठा होता है।

ज्ञान
सूचनाओं का संग्रह नहीं,
अपने भीतर की धूल हटाने की साधना है।
और गुरु,
उस साधना का पहला दीप।

आज गुरु पूर्णिमा पर
मैं किसी चरण में
फूल नहीं रखता।

मैं अपने भीतर
थोड़ा-सा अँधेरा कम करता हूँ।

यही सबसे बड़ी गुरु-दक्षिणा है।

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ।

 

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