जब लाठी लोकतंत्र से बड़ी हो जाए: जंतर मंतर की पीड़ा

जब लाठी लोकतंत्र से बड़ी हो जाए: जंतर मंतर की पीड़ा

जब सवालों का जवाब संवाद से नहीं बल्कि लाठियों से दिया जाता है, तब लोकतंत्र घायल होता है।

लाठी लोकतंत्र 

जब लाठी लोकतंत्र से बड़ी हो जाए,
तो समझो समय घायल है।
जब वर्दियाँ सवालों से डरने लगें,
तो समझो आईना घायल है।

जंतर मंतर की धूप तले
कुछ लोग रोटी नहीं, न्याय माँग रहे थे।
कुछ अपने अधिकारों की लौ बचा रहे थे,
कुछ संविधान के पन्ने पढ़ रहे थे।

फिर अचानक
हवा में आदेश तैरने लगे,
और सड़कों पर
चीखों के फूल बिखर गए।

किसी का माथा फट गया,
किसी की बाँह टूट गई,
किसी की आँखों में
लोकतंत्र का भरोसा टूट गया।

जो अस्पतालों में पड़े हैं,
वे सिर्फ़ घायल शरीर नहीं,
वे इस देश के
अनुत्तरित प्रश्न हैं।

क्या सत्ता इतनी कमज़ोर हो गई
कि उसे हर आवाज़ में विद्रोह दिखता है?
क्या कुर्सियाँ इतनी ऊँची हो गईं
कि उन्हें इंसान दिखाई देना बंद हो गया?

याद रखो,
किसी भी राष्ट्र की ताक़त
उसकी बंद मुट्ठियों में नहीं,
उसके खुले संवाद में होती है।

विद्यार्थियों,
तुम्हारे हाथों में किताबें हैं,
उन्हें सच की मशाल बनाना।
तुम्हारी कलम में स्याही है,
उसे न्याय की भाषा बनाना।

कभी ऐसा समय आने देना
जब डर, विचार से बड़ा हो जाए।
कभी ऐसा समाज बनने देना
जहाँ प्रश्न पूछना अपराध कहलाए।

तुम्हारा संघर्ष
घृणा का नहीं,
मानवता का संघर्ष हो।
तुम्हारी आवाज़
प्रतिशोध की नहीं,
संविधान की आवाज़ हो।

एक दिन इतिहास पूछेगा,
जब सड़कों पर इंसान गिर रहे थे,
तब तुम कहाँ थे?

उस दिन कहना,
हमने पत्थर नहीं उठाए थे,
हमने शब्द उठाए थे।
हमने नफ़रत नहीं बोई थी,
हमने न्याय की फसल बोई थी।

क्योंकि लाठियाँ
शरीर तो तोड़ सकती हैं,
लेकिन विचार नहीं।

और जब विचार ज़िंदा रहते हैं,
तभी लोकतंत्र साँस लेता है।


- गौतम झा

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