पर्दे के पीछे की हकीकत | गरीबी और दिखावे पर कविता

पर्दे के पीछे की हकीकत | गरीबी और दिखावे पर कविता

पर्दे खींच देने से गरीबी नहीं छिपती, बस उसकी तस्वीर कुछ देर के लिए नज़र से ओझल हो जाती है।

पर्दे के पीछे की हकीकत

पर्दों के पीछे हकीकत,
कब तक छिपाओगे सरकार?
झुग्गी-झोपड़ियों को ढंककर,
क्या मिटेगा यह अंधकार?

जिन हाथों ने नींव रखी है
इस चमकते शहर की,
उन्हीं हाथों के छालों पर
पर्दा डालने का यह विचार क्यों?

ब्रिक्स का मेला लगा हुआ है,
बड़े मंच सज जाएंगे,
ऊंची इमारतों के आगे
दीप दिए जलाए जाएंगे।

पर इन टूटी छतों के नीचे
जो भूखे सो जाते हैं,
क्या पर्दे तान देने से
वो दर्द नज़र नहीं आएंगे?

बात तो यह हुई थी साहब,
गरीबी को जड़ से मिटाना है,
रोटी, कपड़ा और मकान
हर एक हाथ को दिलाना है।

फिर आज अचानक यह कैसा
दिखावे का खेल रचाया है?
गरीब को मिटाने के बदले
गरीब को ही क्यों छिपाया है?

विदेशी मेहमान आएंगे,
तारीफों के कसीदे गाएंगे,
चमक-दमक देखकर शायद
वो सच को समझ पाएंगे।

पर जब ये पर्दे हटेंगे
और गाड़ियां गुजर जाएंगी,
तस्वीर वही पुरानी फिर
बेबस सामने आएगी।

दिखावटी शान--शौकत से
देश महान नहीं बनता,
सच्चाई को ढक देने से
कोई सच झूठ नहीं बनता।

नज़रों से ओझल करने से
सवाल नहीं मर जाते हैं,
पर्दे के पीछे छिपे हुए
वो चेहरे भी चिल्लाते हैं।

अगर बदलनी है तस्वीर,
तो नीयत को साफ़ करो।
सिर्फ भाषण और वादों से नहीं,
कुछ तो इंसानियत का काम करो।

झुग्गियों को ढंकना छोड़ो,
उनके जीवन को संवारो तुम।
गरीबी छिपाने से नहीं मिटेगी,
यह बात आज स्वीकारो तुम।

गौतम झा

 

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