खुशी की बस्ती

खुशी की बस्ती

ख़ुशी कोई मंज़िल नहीं, एक ऐसी बस्ती है जहाँ पहुँचने के लिए दुनिया नहीं, अपने भीतर लौटना पड़ता है।

ख़ुशी की बस्ती

ख़ुशी का एहसास तो सबके पास है,
जैसे कोई दूर होकर भी
दिल के सबसे क़रीब, सबसे ख़ास है।

आख़िर ख़ुशी के मायने क्या हैं?
भीड़ तो हर ओर है,
पर अपने कितने यहाँ हैं?

चमक-दमक से रोशन हो जाए जहाँ,
क्या वही जीवन का उजाला है?
यदि मन ही अँधेरा रह जाए,
तो फिर किस बात का हवाला है?

लोग अक्सर पूछते हैं
ख़ुशी का पता कहाँ मिलता है,
मानो वह कोई शहर हो
जो नक़्शों में दर्ज़ मिलता है।

मृगतृष्णाओं के पीछे भागता मन
जाने कहाँ-कहाँ भटक जाता है,
जो अपने भीतर ठहर सके,
वही ख़ुशी का घर पाता है।

सुमन और सुगंध का रिश्ता वही,
जो मिट्टी और पहली बारिश का है;
बिन बोले भी जो मन महका दे,
शायद सुख का स्पर्श वही है।

कुछ बातें चुपचाप
आत्मा को कुरेदती रहती हैं,
जैसे तन्हाई
मासूमियत की सतह पर
धीरे-धीरे खरोंचें लिखती रहती है।

ज़रा ठहरो,
अपने भीतर की धुन सुनो,
अपनी ही मस्ती को पहचानो।

यक़ीन मानो,
ख़ुशी की बस्ती
कहीं और नहीं,
तुम्हारे अपने मन में बसती है।

-      अंकित

-       

Stay Updated with InsightfulTake

Get insightful stories, politics, culture and analysis directly in your inbox.

Subscribe Now →

Leave a Comment