साहिल की आत्महत्या पर मीडिया के झूठे फ़ैसले

साहिल की आत्महत्या पर मीडिया के झूठे फ़ैसले

जब फैसला जांच से पहले लिख दिया जाए, तब सच के लिए सवाल पूछना ही सबसे जरूरी प्रतिरोध बन जाता है।

झूठे फ़ैसले

न गोदी अलग है, न वैकल्पिक अलग,
यहाँ एक ही धुन में बजता है ढोल।
अदालत से पहले ही फैसला सुना,
मीडिया ने थमा दिया अपना ही बोल।

“स्वयं ही गुनहगार था साहिल,” वे बोले,
“
स्वयं ही जिम्मेदार थे पायल, दर्शन, रोहित।”
इतिहास के पन्नों से प्रश्नों को मिटा दो,
कहो, भेदभाव के निशान यहाँ रहे ही नहीं।

जाँच की रिपोर्ट का इंतज़ार क्यों करना,
पुलिस से भी आगे मीडिया की दौड़।
“
मोबाइल से चिटिंग करते पकड़ा गया था,”
बस यही बन गया पूरे सच का जोड़।

चलो, मान भी लें जो तुम कह रहे हो,
तो हॉस्टल के उस कमरे का क्या?
जहाँ लौटकर बैठा था सहमा हुआ साहिल,
उस टूटती हुई मनःस्थिति का क्या?

कहाँ थे वो नियम, कहाँ थी काउंसलिंग,
कहाँ गए संवेदना के दिशा-निर्देश?
सवाल संस्थान से पूछना था शायद,
मगर कैमरों को मिल गया दूसरा संदेश।

निदेशक भी साफ़, प्रोफेसर भी निर्दोष,
व्यवस्था के हिस्से में कोई सवाल नहीं।
पूरे हादसे का दोषी बस वही ठहरा,
जो अब जवाब देने के लिए रहा नहीं।

सच की पड़ताल अभी बाकी थी,
मगर फैसला पहले ही लिख दिया गया।
एक मौत को एक आसान कहानी देकर,
कितना कुछ फिर से अनकहा कर दिया गया।

मीडिया अगर सवाल भी न पूछे,
तो फिर उसकी आवाज़ किसके लिए है?
मृतक की चुप्पी को दोष मत बनाओ,
सच अभी बाकी है, फैसला अभी नहीं।

-गौतम झा

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