त्रेता में राम आए, दीपोत्सव हुआ; कलियुग में राम आएँ, यही हर दीप की प्रार्थना हो।
दीपावली
राम लौटे थे, तभी दीप जले थे,
या दीप जले थे कि राम आएँगे?
यह पर्व हर्ष का, उस मिलन-क्षण का,
या प्रतीक्षारत नयनों के भाव जगाएँगे?
त्रेता में चौदह वर्ष बाद,
अवध में लौटा था सुखद प्रभात।
कलियुग में युग बीते, राह निहारे,
कब लौटेंगे राम हमारे द्वारे?
हर वर्ष अयोध्या दीप सजाती है,
हर देहरी मंगल गान सुनाती है।
पर मन में प्रश्न अनुत्तरित रहता है,
यह स्मरण है या आह्वान कहता है?
क्या दीप जलें उस आगमन की स्मृति में,
या जलते रहें उनके पुनरागमन की आशा में?
क्या उत्सव है उस मिलन की कथा का,
या प्रतीक्षा है फिर रामराज्य की व्यथा का?
त्रेता में राम आए, दीपोत्सव हुआ,
कलियुग में राम आएँ, यही संकल्प हो।
दीपावली केवल अतीत का उल्लास न रहे,
हर दीप में उनके आगमन की आस हो।
-गौतम झा
दीपावली
राम लौटे थे, तभी दीप जले थे,
या दीप जले थे कि राम आएँगे?
यह पर्व हर्ष का, उस मिलन-क्षण का,
या प्रतीक्षारत नयनों के भाव जगाएँगे?
त्रेता में चौदह वर्ष बाद,
अवध में लौटा था सुखद प्रभात।
कलियुग में युग बीते, राह निहारे,
कब लौटेंगे राम हमारे द्वारे?
हर वर्ष अयोध्या दीप सजाती है,
हर देहरी मंगल गान सुनाती है।
पर मन में प्रश्न अनुत्तरित रहता है,
यह स्मरण है या आह्वान कहता है?
क्या दीप जलें उस आगमन की स्मृति में,
या जलते रहें उनके पुनरागमन की आशा में?
क्या उत्सव है उस मिलन की कथा का,
या प्रतीक्षा है फिर रामराज्य की व्यथा का?
त्रेता में राम आए, दीपोत्सव हुआ,
कलियुग में राम आएँ, यही संकल्प हो।
दीपावली केवल अतीत का उल्लास न रहे,
हर दीप में उनके आगमन की आस हो।
-गौतम झा
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