पिताजी की पुण्यतिथि पर एक बेटे की स्मृतियाँ
वह आवाज़ जो अब सुनाई नहीं देती
समय अपनी गति से चलता रहा,
ऋतुएँ बदलीं, वर्ष बदलते गए,
जीवन ने कितने रंग दिखाए,
कुछ सपने पूरे हुए,
कुछ अधूरे ही रह गए।
इस लंबी यात्रा में
बहुत कुछ पीछे छूट गया,
लेकिन कुछ स्मृतियाँ ऐसी हैं
जिन्हें समय भी पीछे नहीं छोड़ पाया।
आज फिर वही तारीख आई है,
जिसने जीवन को दो हिस्सों में बाँट दिया,
एक, जब सिर पर आपका साया था,
दूसरा, जब अपने ही साहस के सहारे
आगे बढ़ना सीखना पड़ा।
अब उम्र के उस पड़ाव पर हूँ
जहाँ लोग अनुभव की बातें करते हैं,
अपने निर्णय स्वयं लेते हैं,
और दूसरों को रास्ते दिखाते हैं।
लेकिन जीवन का अनुभव
एक बात बार-बार सिखाता है,
कि उम्र चाहे जितनी बढ़ जाए,
पिता की अनुपस्थिति में
मन का एक कोना
हमेशा बच्चा बना रहता है।
मिथिला की मिट्टी से उठी स्मृतियाँ,
गाँव की गलियाँ, घर का आँगन,
और उन दिनों की छोटी-छोटी बातें,
आज भी मन में
किसी पुरानी पुस्तक के पन्नों की तरह
सुरक्षित हैं।
कभी किसी परिचित आवाज़ में,
कभी किसी अनजाने चेहरे में,
कभी घर की निस्तब्ध दोपहरी में,
आपकी याद अचानक चली आती है।
और तब समझ में आता है
कि किसी का चले जाना
उसका पूरी तरह चले जाना नहीं होता।
जीवन ने संघर्ष भी दिए,
अवसर भी दिए,
कभी विश्वास को परखा,
कभी धैर्य की परीक्षा ली।
शब्दों के संसार में
अपनी जगह बनाने की कोशिश की,
सच को सच कहने का साहस रखा,
अपनी पहचान के लिए
कई कठिन रास्तों से गुज़रा।
कितनी बार लगा
कि आज अपनी उपलब्धियाँ सुनाता,
कितनी बार मन हुआ
कि असफलताओं का बोझ
कुछ देर आपके सामने रख देता।
शायद कोई समाधान नहीं मिलता,
शायद कुछ विशेष कहा भी नहीं जाता,
लेकिन इतना विश्वास अवश्य रहता
कि मेरी बात सुनने वाला
कोई अपना है।
अब स्वयं एक पिता हूँ,
अपने बेटे के सपनों में
आने वाले कल को देखता हूँ,
उसकी चिंताओं में
अपने बीते दिनों को पहचानता हूँ।
जब उसके भविष्य की चिंता होती है,
तब आपके मन की अनकही चिंताएँ
कुछ अधिक समझ में आती हैं।
कितना कुछ होता है
जो पिता कभी कहते नहीं,
कितनी इच्छाएँ होती हैं
जिन्हें अपने बच्चों के लिए
चुपचाप पीछे छोड़ देते हैं।
यह सब समझने में
कभी-कभी एक पूरी उम्र लग जाती है।
दुनिया सफलता का हिसाब माँगती है,
कितना कमाया, कहाँ पहुँचे,
क्या पाया और क्या खोया।
लेकिन स्मृतियों की अपनी दुनिया है,
जहाँ उपलब्धियों के प्रमाण नहीं माँगे जाते,
जहाँ केवल एक रिश्ता होता है,
जो किसी पद, प्रतिष्ठा
या परिस्थिति का मोहताज नहीं होता।
आपके स्वर में मेरा नाम
केवल एक संबोधन नहीं था,
उसमें मेरा बचपन था,
मेरा घर था,
मेरा निश्चिंत संसार था।
अब वह स्वर नहीं है,
लेकिन उसका अपनापन
स्मृतियों
वह आवाज़ जो अब सुनाई नहीं देती
समय अपनी गति से चलता रहा,
ऋतुएँ बदलीं, वर्ष बदलते गए,
जीवन ने कितने रंग दिखाए,
कुछ सपने पूरे हुए,
कुछ अधूरे ही रह गए।
इस लंबी यात्रा में
बहुत कुछ पीछे छूट गया,
लेकिन कुछ स्मृतियाँ ऐसी हैं
जिन्हें समय भी पीछे नहीं छोड़ पाया।
आज फिर वही तारीख आई है,
जिसने जीवन को दो हिस्सों में बाँट दिया,
एक, जब सिर पर आपका साया था,
दूसरा, जब अपने ही साहस के सहारे
आगे बढ़ना सीखना पड़ा।
अब उम्र के उस पड़ाव पर हूँ
जहाँ लोग अनुभव की बातें करते हैं,
अपने निर्णय स्वयं लेते हैं,
और दूसरों को रास्ते दिखाते हैं।
लेकिन जीवन का अनुभव
एक बात बार-बार सिखाता है,
कि उम्र चाहे जितनी बढ़ जाए,
पिता की अनुपस्थिति में
मन का एक कोना
हमेशा बच्चा बना रहता है।
मिथिला की मिट्टी से उठी स्मृतियाँ,
गाँव की गलियाँ, घर का आँगन,
और उन दिनों की छोटी-छोटी बातें,
आज भी मन में
किसी पुरानी पुस्तक के पन्नों की तरह
सुरक्षित हैं।
कभी किसी परिचित आवाज़ में,
कभी किसी अनजाने चेहरे में,
कभी घर की निस्तब्ध दोपहरी में,
आपकी याद अचानक चली आती है।
और तब समझ में आता है
कि किसी का चले जाना
उसका पूरी तरह चले जाना नहीं होता।
जीवन ने संघर्ष भी दिए,
अवसर भी दिए,
कभी विश्वास को परखा,
कभी धैर्य की परीक्षा ली।
शब्दों के संसार में
अपनी जगह बनाने की कोशिश की,
सच को सच कहने का साहस रखा,
अपनी पहचान के लिए
कई कठिन रास्तों से गुज़रा।
कितनी बार लगा
कि आज अपनी उपलब्धियाँ सुनाता,
कितनी बार मन हुआ
कि असफलताओं का बोझ
कुछ देर आपके सामने रख देता।
शायद कोई समाधान नहीं मिलता,
शायद कुछ विशेष कहा भी नहीं जाता,
लेकिन इतना विश्वास अवश्य रहता
कि मेरी बात सुनने वाला
कोई अपना है।
अब स्वयं एक पिता हूँ,
अपने बेटे के सपनों में
आने वाले कल को देखता हूँ,
उसकी चिंताओं में
अपने बीते दिनों को पहचानता हूँ।
जब उसके भविष्य की चिंता होती है,
तब आपके मन की अनकही चिंताएँ
कुछ अधिक समझ में आती हैं।
कितना कुछ होता है
जो पिता कभी कहते नहीं,
कितनी इच्छाएँ होती हैं
जिन्हें अपने बच्चों के लिए
चुपचाप पीछे छोड़ देते हैं।
यह सब समझने में
कभी-कभी एक पूरी उम्र लग जाती है।
दुनिया सफलता का हिसाब माँगती है,
कितना कमाया, कहाँ पहुँचे,
क्या पाया और क्या खोया।
लेकिन स्मृतियों की अपनी दुनिया है,
जहाँ उपलब्धियों के प्रमाण नहीं माँगे जाते,
जहाँ केवल एक रिश्ता होता है,
जो किसी पद, प्रतिष्ठा
या परिस्थिति का मोहताज नहीं होता।
आपके स्वर में मेरा नाम
केवल एक संबोधन नहीं था,
उसमें मेरा बचपन था,
मेरा घर था,
मेरा निश्चिंत संसार था।
अब वह स्वर नहीं है,
लेकिन उसका अपनापन
स्मृतियों
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