अनंत दूरी: जब प्रेम रह जाता है, इंसान चला जाता है

अनंत दूरी: जब प्रेम रह जाता है, इंसान चला जाता है

कुछ प्रेम कहानियाँ अधूरी नहीं होतीं, वे बस दो दिलों के बीच अनंत दूरी बनकर हमेशा जीवित रहती हैं।

अनंत दूरी

क्षितिज के उस पार,
जहाँ साँझ अपना सिंदूरी आँचल बिछाती है,
तुम किसी और की सुबह का सूरज बन गए,
और मेरे हिस्से में रह गई
वही पुरानी, मूक साँझ,
जिसकी देहरी पर
तुम्हारी पायल की आहटें
सदियों से सोई हैं।

मैंने तुम्हें बाँधने की
कभी चेष्टा नहीं की,
क्योंकि प्रेम तो
मुक्त आकाश का विस्तार है।
पर जब तुम्हारी छाँव
किसी और आँगन में सिमट गई,
तो मेरे एकांत के कक्ष में
तुम्हारी स्मृतियों का
एक वीरान दिया
अब भी टिमटिमा रहा है।

समय के इस असीम समंदर में,
हम दो अलग नावें थे,
जो कभी एक ही किनारे से चली थीं,
मगर नियति की लहरों ने
हमें अलग-अलग दिशाओं में मोड़ दिया।

तुम्हारे पास संसार का कोलाहल है,
उसकी भीड़, उसकी सांत्वना,
और मेरे हिस्से में रह गया है
बस यह मौन,
जो तुम्हारी हर आहट को
आज भी अकेले में सुनता है।

शायद प्रेम का सबसे गहरा सत्य
मिलन में नहीं होता,
वह उस दूरी में छिपा होता है
जहाँ दो लोग
एक-दूसरे के जीवन से चले तो जाते हैं,
पर एक-दूसरे के अस्तित्व से
कभी विदा नहीं होते।

तुम अपनी सुबहों में
मुझे भूल भी जाओ,
तो कोई शिकायत नहीं...
मैं अपनी साँझ में
तुम्हें याद रखूँगा।

क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ
अधूरी नहीं होतीं,
वे बस समय की किताब में
उस पन्ने पर ठहर जाती हैं,
जिसे पलटने का साहस
न समय को होता है,
न उन लोगों को
जिनकी स्मृतियों में
वह पन्ना आज भी जीवित रहता है।

-गौतम झा

 

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