गाँधी जयंती: अहिंसा का महानायक

गाँधी जयंती: अहिंसा का महानायक

लाठी थामे वह शख़्स चला था, लेकिन उसके कदमों की आहट ने एक साम्राज्य की नींव हिला दी।

अहिंसा का महानायक

खादी की इस बारीक तानी में,
रूह के उस महात्मा का सूत उलझा है।
ज़मीन पर रेंगती हुई ख़ामोशी ने
आसमान के सारे शोर को
मुट्ठी में भींच लिया है।

वह जो राह पर लाठी टिकाकर चलता था,
असल में वक्त को
अपनी लकीर पर चलाता था।

आज़ादी का पैग़ाम कुछ यूँ पिरोया उसने,
रूमी की तरह,
जहाँ आँच न हो, सिर्फ़ रोशनी हो,
जहाँ तलवारें पिघलकर
आईना बन जाएँ।

और गुलज़ार की-सी उस भीगी हुई शाम में,
चरखे के गोल पहिए से उड़ती हुई
सूती हवा
गुज़रती है आज भी
पोर-पोर से छनकर।

“नम्रता से ही तुम हिला सकते हो जहाँ को”
यह कोई लफ़्ज़ भर नहीं,
किसी महात्मा के साज़ से निकला हुआ
कोई पुराना राग है।

एक लाठी,
दो शीशे के गोल दायरे,
और सीने में जलता हुआ
मुद्दतों का दिया।

उसने बताया
कि क्रांति शोर से नहीं,
सत्य के धीमे,
ठहराव भरे कदमों से आती है।

आज भी जब हवा में खद्दर सरसराती है,
लगता है वही महात्मा
मुस्कुराकर कहता है—

अहिंसा ही मोहब्बत का
सबसे बड़ा मकाम है।

  -गौतम झा

 

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