खिचड़ी केवल एक व्यंजन नहीं, सादगी, समरसता और भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत प्रतीक है। पढ़िए यह भावपूर्ण कविता, जो साधारण में असाधारण का सौंदर्य खोजती है।
खिचड़ी
एक पात्र में जब संग पकें,
चावल, दाल मिलकर एक रहें।
भेद सभी फिर गल जाते हैं,
स्वाद नए से फल जाते हैं।
सादगी इसका श्रृंगार है,
स्वास्थ्य इसका उपहार है।
सुगम, सुपाच्य, शीतल स्वभाव,
तन-मन को देता नव प्रभाव।
न इसमें तीखे आडंबर,
न मसालों का है समुंदर।
फिर भी अपनी मौन सुगंध से,
जीत ले मन को सहज प्रबंध से।
नीरस कहना भूल हमारी,
यही तो इसकी विनय न्यारी।
सादेपन की ओढ़े चादर,
रस की बहती इसमें गागर।
पाक-विधि इसकी सरल बहुत,
नहीं किसी वैभव की चाहत।
थोड़े जल में, थोड़ी आँच,
यही स्वाद की सच्ची जाँच।
दही मिले तो शीतलता है,
घी मिले तो स्निग्ध ममता है।
अचार, पापड़, हरी चटनी,
साथ निभाएँ बनकर अपनी।
बीमारों की पहली आशा,
शिशुओं की मधुर अभिलाषा।
वृद्ध हृदय की सहज सहेली,
ममता जैसी कोमल, अलबेली।
भूख मिटाना ही उद्देश्य नहीं,
यह जीवन का संदेश सही।
भिन्न दानों का एक मिलन,
यही तो भारत का है वंदन।
जाति, वर्ण या ऊँच-नीच,
सब गल जाते इसके बीच।
जैसे दाल और चावल मिलकर,
रचते हैं नव जीवन सुंदर।
नहीं दिखावा, नहीं अहंकार,
नहीं वैभव का कोई भार।
सरल हृदय का यह व्यवहार,
यही इसका सच्चा श्रृंगार।
घर-घर जिसकी अपनी थाली,
हर ऋतु में जिसकी रखवाली।
अन्नपूर्णा का यह प्रसाद,
सादगी में छिपा संवाद।
जो जितना सहज हो जाता,
जीवन उतना सुख दे जाता।
खिचड़ी केवल व्यंजन नहीं,
भारतीय मन का दर्शन है यही।
सादा जीवन, निर्मल विचार,
यही इसका शाश्वत उपहार।
हर रसोई में रहे सदा आन,
खिचड़ी का अपना सम्मान।
– गौतम झा
खिचड़ी
एक पात्र में जब संग पकें,
चावल, दाल मिलकर एक रहें।
भेद सभी फिर गल जाते हैं,
स्वाद नए से फल जाते हैं।
सादगी इसका श्रृंगार है,
स्वास्थ्य इसका उपहार है।
सुगम, सुपाच्य, शीतल स्वभाव,
तन-मन को देता नव प्रभाव।
न इसमें तीखे आडंबर,
न मसालों का है समुंदर।
फिर भी अपनी मौन सुगंध से,
जीत ले मन को सहज प्रबंध से।
नीरस कहना भूल हमारी,
यही तो इसकी विनय न्यारी।
सादेपन की ओढ़े चादर,
रस की बहती इसमें गागर।
पाक-विधि इसकी सरल बहुत,
नहीं किसी वैभव की चाहत।
थोड़े जल में, थोड़ी आँच,
यही स्वाद की सच्ची जाँच।
दही मिले तो शीतलता है,
घी मिले तो स्निग्ध ममता है।
अचार, पापड़, हरी चटनी,
साथ निभाएँ बनकर अपनी।
बीमारों की पहली आशा,
शिशुओं की मधुर अभिलाषा।
वृद्ध हृदय की सहज सहेली,
ममता जैसी कोमल, अलबेली।
भूख मिटाना ही उद्देश्य नहीं,
यह जीवन का संदेश सही।
भिन्न दानों का एक मिलन,
यही तो भारत का है वंदन।
जाति, वर्ण या ऊँच-नीच,
सब गल जाते इसके बीच।
जैसे दाल और चावल मिलकर,
रचते हैं नव जीवन सुंदर।
नहीं दिखावा, नहीं अहंकार,
नहीं वैभव का कोई भार।
सरल हृदय का यह व्यवहार,
यही इसका सच्चा श्रृंगार।
घर-घर जिसकी अपनी थाली,
हर ऋतु में जिसकी रखवाली।
अन्नपूर्णा का यह प्रसाद,
सादगी में छिपा संवाद।
जो जितना सहज हो जाता,
जीवन उतना सुख दे जाता।
खिचड़ी केवल व्यंजन नहीं,
भारतीय मन का दर्शन है यही।
सादा जीवन, निर्मल विचार,
यही इसका शाश्वत उपहार।
हर रसोई में रहे सदा आन,
खिचड़ी का अपना सम्मान।
– गौतम झा
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