इतिहास के पन्नों का सच: एकता, न्याय और इंसानियत की गूंज

इतिहास के पन्नों का सच: एकता, न्याय और इंसानियत की गूंज

जब इतिहास अपने पन्ने खोलेगा, तब यह भी दर्ज होगा कि मुश्किल समय में किसने नफ़रत बोई और किसने इंसानियत का हाथ थामा।

इतिहास के पन्नों का सच

इतिहास के पन्नों पर यह दौर भी दर्ज़ होगा,
सच किसके संग था, झूठ किसके पक्ष मेंसब स्पष्ट होगा।

जब हक़ की ख़ातिर छात्र सड़कों पर उतर आए थे,
कलम, किताब और अपने भविष्य के लिए न्याय माँगने आए थे।

उनके संग दलित और आदिवासी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे,
जो सदियों से अन्याय के घाव अपने सीने में लिए खड़े थे।
आज वही बनकर ढाल, हर अत्याचार के सामने अडिग थे,
आँखों में उम्मीद, होंठों पर साहसऔर इरादों में दृढ़ थे।

मज़हब की दीवारें उस दिन ख़ामोशी से ढह गई थीं,
जब मुस्लिम भाइयों की मोहब्बत रोटियों में महक गई थी।
भूख हिंदू होती है, मुसलमान, किसी जात की पहचान,
वह तो बस इंसान की होती हैऔर इंसानियत ही उसका सम्मान।

प्यासे होंठों तक पानी पहुँचाने का बीड़ा सिखों ने उठाया,
लंगर की अमर परंपरा ने फिर मानवता का अर्थ समझाया।
सेवा की निर्मल धारा ने हर दूरी को बहा दिया,
नफ़रत के गहरे अँधेरों में प्रेम का दीप जला दिया।

और देखो, कैसी विडंबना थी इस दौर की सियासत की
जो खुद को ठेकेदार कहते थे देशभक्ति और हिफ़ाज़त की।
हाथों में तिरंगा लिए, राष्ट्रप्रेम का दावा करते थे,
पर इसी एकता, इसी भाईचारे पर सवाल उठाते थे।

वे विरोध कर रहे थे हक़ की उस सच्ची लड़ाई का,
मज़ाक उड़ा रहे थे इंसानियत और साझी भलाई का।
पर समय सबसे बड़ा साक्षी हैवह सब याद रखेगा,
कौन दीवारें खड़ी करता रहा, कौन पुल बनाता रहेगा।

जब-जब नफ़रत की आँधी इस वतन को डगमगाएगी,
यही साझा चूल्हा, यही लंगर, यही पानी राह दिखाएगी।
क्योंकि मुल्क नारों से चलता है, केवल झंडों की शान से
मुल्क बचता है इंसानियत, न्याय और आपसी सम्मान से।

— गौतम झा

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