जब रंग आत्मा को छूते हैं
वसंत की यह भोर केवल ऋतु-परिवर्तन नहीं,
यह समय की शुष्क शाखाओं पर लौटती हुई हरियाली का स्पर्श है।
आज जब आकाश में रंगों की धूल उड़े,
तो वह केवल हवा को नहीं,
आपके भीतर के निस्तब्ध आकाश को भी आलोकित करे।
जीवन के आँगन में
एक शांत दीप जले—
ऐसा दीप जिसकी लौ बाहरी उत्सव से नहीं,
भीतर की जागृति से दीप्त हो।
पलाश की अग्नि जब वन को प्रकाशित करती है,
तो वह केवल रंग नहीं बिखेरती,
वह स्मरण कराती है कि दहकना भी एक सौंदर्य है।
वैसे ही आनंद की ज्वाला
आपके अंतर्मन के अंधकार को छूकर
उसे स्वर्णिम आभा में रूपांतरित कर दे।
जो बीत गया—
वह संध्या की धूल बन
स्मृतियों की पगडंडी पर शांत हो जाए।
जो आने वाला है—
वह इंद्रधनुष की तरह
आपके क्षितिज पर ठहरे,
आश्वस्ति और संभावना के सात रंग लेकर।
रंग केवल कपोलों तक सीमित न रहें।
वे आपके विचारों में उतरें,
आपकी दृष्टि को विस्तृत करें।
वे आपकी वाणी में मधुरता बनकर बहें,
और आपके कर्मों में करुणा की निरंतर धारा बन जाएँ।
आज जब दिशाएँ अबीर से भर उठें,
जब हवा में गुलाल की गंध एक अनकही कविता लिखे,
तब आपका हृदय भी विश्वास से भर उठे—
कि जीवन स्वयं एक उत्सव है,
एक अनलिखी रचना,
जिसे सृष्टि ने रंगों की स्याही से रचा है।
हम सब उस विराट चित्रपट पर
एक-एक आवश्यक रंग हैं—
कभी गहन, कभी कोमल,
कभी उज्ज्वल, कभी शांत—
पर प्रत्येक अपने स्थान पर अनिवार्य।
इस होली, रंग केवल खेल न बनें,
वे आत्मा का अंतःसंगीत बनें—
जहाँ प्रेम स्वर हो,
करुणा ताल हो,
और आशा अनवरत गूँजती धुन।
रंगों का यह उत्सव आपके भीतर के प्रकाश को पहचानने का क्षण बने।
और जब रंग धुल जाएँ,
तब भी वह प्रकाश बना रहे।
— गौतम झा