मुखौटे और विश्वास
इतिहास साक्षी है उस छल का,
जो साधु के वेश में आया था,
रावण ने भी सीता माँ को,
बस इसी रूप में भरमाया था।
वो एक सीख दे गया हमको—
चेहरों पर विश्वास न करना तुम,
भीतर छिपे उस रावण को पढ़ना,
सत्य का ही अनुसरण करना तुम।
पर अफसोस...
आज भी वही कहानी है,
वही पुरानी भूल हमारी है,
आँखों पर पट्टी बँधी हुई,
अंधभक्ति में डूबी ये दुनिया सारी है।
गेरुआ ओढ़े कुछ चेहरे आते,
हम श्रद्धा में शीश झुकाते हैं,
अपना विश्वास, अपनी आस्था,
कितनों पर यूँ ही लुटाते हैं।
त्रेता में ही चेताया था—
हर साधु सच्चा नहीं होता,
कुछ चेहरों के पीछे छिपा,
अंधकार भी कम नहीं होता।
पर आने वाली पीढ़ियों ने,
उस सीख को ही भुला दिया,
इसीलिए तो आज पुनः
छल ने अपना जाल बिछा लिया।
जागो अब, हे भारतवासियो,
विवेक का दीप जलाना होगा,
भेष नहीं, तुम कर्म को देखो,
ये अंतर समझ पाना होगा।
श्रद्धा रखो—पर आँखें खोलकर,
खुद को यूँ मत भरमाने दो,
इतिहास फिर दोहरा रहा खुद को,
अब तो सच को पहचानने दो।
-- गौतम झा