अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस: “जिस दिन की छुट्टी नहीं होती”

अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस: “जिस दिन की छुट्टी नहीं होती”

जब ज़िंदगी हर रोज़ काम मांगती है, तो क्या एक दिन का “मज़दूर दिवस” उनकी कहानी कहने के लिए काफ़ी है?

अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस

मई की पहली सुबह है,
कैलेंडर पर लाल निशान,
कहते हैं आज मज़दूर दिवस है,
पर उसके घर में आज भी
समय पर जलता चूल्हा ही पहचान।

किसी के लिए छुट्टी का दिन,
किसी के लिए बस एक पोस्ट,
पर उसके लिए वही भागदौड़,
ना कम होती जिम्मेदारी,
ना हल्का होता बोझ।

वो जो भीड़ में रोज़ घुलता है,
पूरी तरह मज़दूर कहलाता,
अमीरों में गिना जाता,
बीच में अटका,
मध्यमवर्ग का सच बन जाता।

ईएमआई के फंदे में सांसें,
सपने किस्तों में बिक जाते,
बच्चों की फीस, घर का किराया,
हर महीने हिसाब सिखाते।

उसके लिए कोई मंच नहीं,
ना कोई नारा, ना सम्मान,
वो चुपचाप दिन गुज़ार देता,
यही उसकी पहचान।

वो भी तो मेहनतकश ही है,
बस उसके हाथों में छाले नहीं,
उसके माथे का पसीना
अक्सर दिखता ही नहीं।

कहते हैं,
दिवस कमज़ोर का मनाया जाता है…”
तो फिर ये सवाल भी उठता है,
जो हर दिन लड़ता है ज़िंदगी से,
क्या वो कमज़ोर नहीं होता है?

आज फिर भाषण गूंजेंगे,
और नारों की भीड़ लगेगी,
पर वो चुपचाप काम करेगा,
क्योंकि उसकी दुनिया
रुकने से नहीं चलेगी।

तो सोचो ज़रा,
जिस दिन की छुट्टी नहीं होती,
क्या वही असली मेहनत नहीं होती?

मज़दूर दिवस पर
उन सभी को सलाम,
जो हर दिन काम करते हैं,
बिना किसी नाम।

गौतम झा

 

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