भावनाओं का बाज़ार: जहाँ प्रतिज्ञाएँ मूल्य पर टिकती हैं

भावनाओं का बाज़ार: जहाँ प्रतिज्ञाएँ मूल्य पर टिकती हैं

पण्य और प्रतिज्ञा

प्रपंच नहीं, यह यथार्थ हैकि जग में छल का अभाव नहीं,
है क्रय-विक्रय का खेल यहाँ, अब निष्ठा का सम्मान नहीं।

हम जिसे समझतेवंचना’, वह केवल एक व्यापार है,
स्वार्थ की ऊँची वेदी पर, बस अर्थ का ही सत्कार है।

वे द्रोह नहीं करते तुमसे, वे केवल बिकने आते हैं,
उचित मूल्य की देहरी पर, सब वादे ठहर जाते हैं।

तुम रिक्त हस्त ही खड़े रहे, निज प्रेम-समर्पण लेकर ही,
वे बाट जोहते रहे सदा, स्वर्णमयी पथ पाकर ही।

तुम जिसे हृदय का दान कहो, वह जग को भार प्रतीत हुआ,
जहाँ द्रव्य की शक्ति प्रबल हुई, वहाँ सत्य सदा ही रीति हुआ।

अपराध नहीं था उनका कोई, संशय की कोई बात थी,
बस उन्हें ख़रीद पाने की, तुम्हारी वह औकात थी।

है हाट लगा जज़्बातों का, हर शख़्स यहाँ पर नश्वर है,
मानव की ऊँची निष्ठा का, अब सिक्का ही परमेश्वर है।

तो मलाल कर इस दूरी का, मन में कोई क्लेश रख,
बाज़ार के इस कोलाहल में, बस मौन का ही परिवेश रख।

— गौतम झा

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