मौन का अनुष्ठान
मांग के सिंदूर और ललाट की उस शांत बिंदु के बीच
एक अनाम आकाश ठहरा है—
जिसे हमने जीवन भर
स्पर्श से पहले ही त्याग दिया।
दृष्टि के इस जगत में हम पूर्ण माने जाते हैं,
अपने-अपने गृहों में प्रतिष्ठित, सुरक्षित—
किन्तु उस पूर्णता के आवरण तले
एक निरंतर रिक्तता है,
जो न समय से भरती है, न स्मृति से।
हम मिलते हैं—
पर केवल शिष्टाचार के उस संयमित वृत्त में,
जहाँ शब्दों के अर्थ गहरे होते हैं,
और स्वर—मानो किसी व्रत की तरह धीमे।
तुम जल का पात्र बढ़ाती हो,
मैं कृतज्ञता का एक साधारण शब्द कह देता हूँ—
पर उस क्षण की सूक्ष्म दरार में
युगों का अव्यक्त विलाप
निशब्द बह उठता है।
समाज की मर्यादाओं की यह ऊँची प्राचीर—
न तुम्हारी पवित्रता इसे लाँघने देती है,
न मेरे साहस में इतनी अग्नि शेष है।
हम दो तट हैं—
जिन्हें एक ही नदी ने
सदैव के लिए पृथक कर दिया है।
साथ-साथ बहते हुए भी
हम मिल नहीं सकते—
इस आँगन में नहीं,
इस जन्म में नहीं।
तुम्हारी आँखों की शांति में
एक धीमी पुकार दबी रहती है—
उसे सुनकर भी अनसुना कर जाना
अब मेरा सबसे कठिन तप है।
यह ढलती आयु,
दायित्वों से भरी हुई यह संध्या—
इसके बीच हमारा यह मौन अनुराग
एक पवित्र, किन्तु निषिद्ध जप बन गया है।
हम—अधूरी साधना के दो उपासक,
जिन्हें मंदिर के भीतर प्रवेश नहीं,
द्वार पर ही अपने अस्तित्व को विसर्जित करना है।
किसी अगले जन्म की संभावना में
इस जन्म की प्यास को
बिना प्रश्न, बिना आक्रोश—
बस नियति की ओर मोड़ देना है।
- गौतम झा