सनातन संस्कृति की दृष्टि में प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि साक्षात् ईश्वर का स्वरूप है।
वेदों का संदेश
वेदों की ऋचाएँ कहती हैं—यह भूमि हमारी माता है,
हर वृक्ष यहाँ एक देवता है, जो जीवन का अमृतदाता है।
"माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" का पावन मंत्र जब स्मरण रहा,
फिर क्यों आधुनिकता के मद में मानव इतना संहारक बन गया?
पंचतत्व की दिव्य सत्ता
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा—ये पाँचों प्रभु के रूप यहाँ,
इनको जो दूषित करता है, वह पाए अपना स्वरूप कहाँ?
गंगा की धारा शिव की जटा, यमुना में श्याम समाए हैं,
नदियों को केवल जल मत समझो, ये देवत्व की जीवित गाथाएँ हैं।
वायुदेव का प्रत्येक झोंका प्राणवायु बनकर बहता है,
यज्ञ और हवन की पावन समिधा से वातावरण शुद्ध रहता है।
पर आज धुएँ के दानव ने अंबर का आँचल मैला किया,
जिस विष को स्वयं पीना था, उसे धरती के कंठ में उँडेल दिया।
तरुवर में नारायण का वास
तुलसी, पीपल, बरगद, नीम—सबमें देवों का निवास है,
पीपल में साक्षात् केशव हैं, जिनका स्मरण ही उल्लास है।
एक वृक्ष को काटना मानो जीवन के सूत्र को तोड़ जाना,
"दशपुत्रसमो वृक्षः" कहकर शास्त्रों ने इसका गौरव माना।
तरुवर की शीतल छाया में ऋषियों ने परम ज्ञान पाया,
प्रकृति की शांत तपोभूमि में ईश्वर ने अपना रूप रचाया।
गोवर्धन को उँगली पर उठाकर माधव ने यही सिखाया था,
प्रकृति की पूजा ही सच्ची पूजा है—यह संदेश सुनाया था।
जाग उठो! यही सनातन धर्म है
"अहिंसा परमो धर्मः" केवल जीवों तक सीमित नहीं होती,
जब हरी डालियाँ कटती हैं, तब अंतरात्मा भी मौन रोती।
भोगवादी इस अंधी दौड़ में मत भूलो अपनी मर्यादा,
प्रकृति का दोहन उतना ही हो, जितनी हो वास्तविक आवश्यकता।
आओ, लौट चलें फिर वेदों की ओर, इस धरा को स्वर्ग बनाना है,
हर आँगन में एक पौधा रोपकर सोई चेतना को जगाना है।
जब रक्षित होगी प्रकृति हमारी, तभी सुरक्षित संसार होगा,
पर्यावरण की रक्षा ही ईश्वर का सच्चा सत्कार होगा।
प्रकृति केवल धरा नहीं, परमात्मा की सजीव अभिव्यक्ति है,
हर पत्ती में उसकी छाया, हर कण में दिव्य उपस्थिति है।
वृक्षों की हरियाली, नदियों की निर्मलता, शीतल पवन का स्पर्श,
इन्हीं में बसता संस्कृति का वैभव, जीवन का चिरंतन हर्ष।
यही हमारी आस्था, यही भविष्य की अमूल्य निधि है,
इन्हीं के संरक्षण में मानवता की सच्ची समृद्धि है।
आओ, पर्यावरण रक्षा को केवल अभियान न मानें,
अपने सनातन कर्तव्य का पावन आह्वान जानें।
धरा सुरक्षित, जीवन सुरक्षित—यही सृष्टि का सार होगा,
प्रकृति का सम्मान ही ईश्वर का सच्चा सत्कार होगा।
— गौतम झा
वेदों का संदेश
वेदों की ऋचाएँ कहती हैं—यह भूमि हमारी माता है,
हर वृक्ष यहाँ एक देवता है, जो जीवन का अमृतदाता है।
"माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" का पावन मंत्र जब स्मरण रहा,
फिर क्यों आधुनिकता के मद में मानव इतना संहारक बन गया?
पंचतत्व की दिव्य सत्ता
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा—ये पाँचों प्रभु के रूप यहाँ,
इनको जो दूषित करता है, वह पाए अपना स्वरूप कहाँ?
गंगा की धारा शिव की जटा, यमुना में श्याम समाए हैं,
नदियों को केवल जल मत समझो, ये देवत्व की जीवित गाथाएँ हैं।
वायुदेव का प्रत्येक झोंका प्राणवायु बनकर बहता है,
यज्ञ और हवन की पावन समिधा से वातावरण शुद्ध रहता है।
पर आज धुएँ के दानव ने अंबर का आँचल मैला किया,
जिस विष को स्वयं पीना था, उसे धरती के कंठ में उँडेल दिया।
तरुवर में नारायण का वास
तुलसी, पीपल, बरगद, नीम—सबमें देवों का निवास है,
पीपल में साक्षात् केशव हैं, जिनका स्मरण ही उल्लास है।
एक वृक्ष को काटना मानो जीवन के सूत्र को तोड़ जाना,
"दशपुत्रसमो वृक्षः" कहकर शास्त्रों ने इसका गौरव माना।
तरुवर की शीतल छाया में ऋषियों ने परम ज्ञान पाया,
प्रकृति की शांत तपोभूमि में ईश्वर ने अपना रूप रचाया।
गोवर्धन को उँगली पर उठाकर माधव ने यही सिखाया था,
प्रकृति की पूजा ही सच्ची पूजा है—यह संदेश सुनाया था।
जाग उठो! यही सनातन धर्म है
"अहिंसा परमो धर्मः" केवल जीवों तक सीमित नहीं होती,
जब हरी डालियाँ कटती हैं, तब अंतरात्मा भी मौन रोती।
भोगवादी इस अंधी दौड़ में मत भूलो अपनी मर्यादा,
प्रकृति का दोहन उतना ही हो, जितनी हो वास्तविक आवश्यकता।
आओ, लौट चलें फिर वेदों की ओर, इस धरा को स्वर्ग बनाना है,
हर आँगन में एक पौधा रोपकर सोई चेतना को जगाना है।
जब रक्षित होगी प्रकृति हमारी, तभी सुरक्षित संसार होगा,
पर्यावरण की रक्षा ही ईश्वर का सच्चा सत्कार होगा।
प्रकृति केवल धरा नहीं, परमात्मा की सजीव अभिव्यक्ति है,
हर पत्ती में उसकी छाया, हर कण में दिव्य उपस्थिति है।
वृक्षों की हरियाली, नदियों की निर्मलता, शीतल पवन का स्पर्श,
इन्हीं में बसता संस्कृति का वैभव, जीवन का चिरंतन हर्ष।
यही हमारी आस्था, यही भविष्य की अमूल्य निधि है,
इन्हीं के संरक्षण में मानवता की सच्ची समृद्धि है।
आओ, पर्यावरण रक्षा को केवल अभियान न मानें,
अपने सनातन कर्तव्य का पावन आह्वान जानें।
धरा सुरक्षित, जीवन सुरक्षित—यही सृष्टि का सार होगा,
प्रकृति का सम्मान ही ईश्वर का सच्चा सत्कार होगा।
— गौतम झा
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