हम बोलेंगे: सोनम वांगचुक के संकल्प और लोकतंत्र की आवाज़

हम बोलेंगे: सोनम वांगचुक के संकल्प और लोकतंत्र की आवाज़

जब सत्य को जंतर-मंतर से उठाया गया, तब आवाज़ और बुलंद हो गई। यह कविता उसी अदम्य संकल्प, लोकतांत्रिक चेतना और न्याय की पुकार का शंखनाद है।

हम बोलेंगे!

यह तय है, अब हम बोलेंगे,
तुम लाख लगाओ पहरे,
हम सत्य की आवाज़ बनकर बोलेंगे।

जब भोर हुई, पौने आठ बजे,
तुम सत्ता का बल लेकर आए,
बीस दिनों से तपते एक सत्याग्रही को
जंतर-मंतर से उठाने आए।

जिस तन में केवल हड्डियाँ थीं,
उसमें भी हिमालय धड़कता था,
जिस आँख में केवल मौन था,
उसमें पूरा भारत जागता था।

तुम बिस्तर लेकर चल दिए,
तुम तंबू भी उखाड़ ले गए,
पर क्या संकल्प उठा पाओगे?
क्या विचारों को बाँध सकोगे?

याद रखो, राजसिंहासनों,
देह को कैद किया जाता है,
पर सत्य का स्वर
कभी कैद नहीं होता।

यह तय है, अब हम बोलेंगे।

जब अन्याय की हर दीवार गिरेगी,
जब छल का हर सिंहासन डोलेगा,
जब लद्दाख की बर्फ़ीली चोटियों से
जन-जन का स्वर गूँजेगा,

तब डर के ताले टूटेंगे,
तब झूठ के चेहरे छूटेंगे।
जो धरती, जल और भविष्य की रक्षा में बैठे हैं,
उन्हें इतिहास कभी नहीं हराएगा।

तुम जंतर-मंतर खाली करा सकते हो,
पर जन-मन को कैसे खाली करोगे?
तुम रास्ते रोक सकते हो,
पर विचारों की यात्रा कैसे रोकोगे?

जिस दिन जनता उठ खड़ी होगी,
हर चुप्पी हुंकार बनेगी,
हर आँसू अंगार बनेगा,
हर कदम परिवर्तन बनेगा।

यह तय है, अब हम बोलेंगे।
तुम लाख लगाओ पहरे,
हम सत्य, न्याय और संविधान की आवाज़ बनकर बोलेंगे।

हम बोलेंगे।
ज़रूर बोलेंगे।

 -गौतम झा

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