भूख का विद्रोह: रीढ़-विहीन व्यवस्था के विरुद्ध अनशन

भूख का विद्रोह: रीढ़-विहीन व्यवस्था के विरुद्ध अनशन

जब न्याय बिकने लगे और भविष्य गिरवी रख दिया जाए, तब भूख भी विद्रोह बन जाती है। 'भूख का विद्रोह' केवल एक कविता नहीं, बल्कि व्यवस्था से जवाब मांगती हर युवा आवाज़ की गूंज है।

भूख का विद्रोह

श्रम की पावन बूँदें जब, बाज़ारों में नीलाम हुईं,
तब जंतर-मंतर की सड़कें, दिल्ली की पहचान हुईं।

अठारह दिनों का यह व्रत, केवल क्षुधा का दान नहीं,
यह न्यायाग्नि की तपश्चर्या है, किसी याचक का मान नहीं।

जिस मेधा ने रातें जागीं, आँखों में स्वप्न सँजोए थे,
नीट के बंद लिफ़ाफ़ों में, लाखों भविष्य रोए थे।

कुछ काग़ज़ी सौदागरों ने, जब राष्ट्र का विश्वास लूटा,
तब एक तपस्वी खड़ा हुआ, जिसने जीवन दाँव लगाया।

घटती साँसें, झुकती काया, पर अटल संकल्प अडिग रहा,
सत्ता के पत्थर हृदयों पर, उसका अनशन वज्र बना।

कुर्सी की नैतिक मृत्यु पर, अब चुप रहना पाप भी है,
इस सड़े हुए भ्रष्ट तंत्र पर, भूख सबसे तीखा शाप भी है।

यह केवल अन्न का त्याग नहीं, यह आत्मसम्मान की ज्वाला है,
जब तक यह पर्चा साफ़ हो, तब तक हर युवा मशाल है।

जो सत्ता सत्य दबाती है, वह सत्ता टिक नहीं पाएगी,
जनमन की जागी अग्नि एक दिन, हर दीवार पिघलाएगी।

इतिहास सदा यह कहता है, अन्याय अधिक दिन जीता कब,
जब-जब जनता जाग उठी है, टूटा हर झूठा सिंहासन तब।

उठो युवाओं, अब मौन नहीं, अन्याय को ललकारो तुम,
अपने श्रम, अपने स्वप्न, अपने अधिकारों का मान सँवारो तुम।

जिस दिन जनशक्ति जाग उठे, हर छल का अंत सुनिश्चित है,
रीढ़-विहीन व्यवस्थाओं का, पतन सदा अवश्यम्भावित है।

-गौतम झा

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