सुल्तान-ए-धुआँ: एक राजनीतिक व्यंग्य कविता

सुल्तान-ए-धुआँ: एक राजनीतिक व्यंग्य कविता

क्या सत्ता का ताज जनता के सवालों से बड़ा हो सकता है? पढ़िए 'सुल्तान-ए-धुआँ'—एक ऐसी राजनीतिक व्यंग्य कविता जो धुएँ के पीछे छिपे सच से रूबरू कराती है।

सुल्तान--धुआँ

ताज पहनकर बैठा है,
पर चेहरों पर धूल बहुत,
वादों की ऊँची मीनारें,
नींव में लेकिन शूल बहुत।

हर चौक पर जयघोष गूँजे,
हर मंच पर उत्सव की बात,
पर भूखे पेटों की खामोशी,
पूछ रही है असली बात।

धुएँ में लिपटे सपनों का,
कैसा यह दरबार बना?
रोटी, रोज़ी, शिक्षा, स्वास्थ्य
सब पर जैसे भार बना।

जो प्रश्न करे, वह दोषी ठहरे,
जो मौन रहे, वह ठीक कहा।
लोकतंत्र की खुली हवा में,
क्यों डर का बादल घिरता रहा?

तस्वीरों से राज नहीं चलता,
जनमन का विश्वास चाहिए।
ताज नहीं, उत्तरदायित्व का
हर पल एहसास चाहिए।

इतिहास किसी का दास नहीं,
जनता अंतिम फ़रमान है।
सिंहासन ऊँचा हो चाहे,
सबसे ऊँचा संविधान है।

धुएँ का हर बादल छँटेगा,
जब सच की हवा बह जाएगी।
राज नहीं, जनसेवा ही
नेता की पहचान कहलाएगी।

गौतम झा

 

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