पिता केवल जीवन नहीं देते, वे जीवन जीने का साहस, संस्कार और दिशा भी देते हैं। यह कविता उसी अनमोल ऋण को शब्दों में समर्पित एक विनम्र प्रयास है।
पिता का ऋण
इस कलम से जो लिखा, वो तेरी कहानी है,
मौन त्याग, मर्म और प्रेम की निशानी है।
नाराज़गी कम, अपनापन बेमिसाल,
पिता है तू, जैसे पर्वत-सा विशाल।
जैसे ढलती शाम में उम्मीद का सवेरा,
हर कठिन मोड़ पर मिला है साथ तेरा।
सूरज ढल जाए, पर तू नहीं हारता,
हर चुनौती में मुझे नया आकार देता।
तूने जो बोए थे संस्कारों के बीज,
आज भी महकते हैं मेरे हर निर्णय में।
जीवन की राहों पर जब भी हुआ अँधेरा,
तेरी सीख ने बनकर दीपक रास्ता घेरा।
जब थामा था तूने मेरा नन्हा-सा हाथ,
तभी समझे मैंने दुनिया के हर जज़्बात।
तेरी छाया जैसे कोई पावन धाम,
जहाँ सुकून मिले हर सुबह और हर शाम।
तेरी सीखें हैं अनमोल धरोहर मेरी,
सहेज कर रखी हैं बातें तेरी-मेरी।
इस कागज़ पर उतरी मेरी हर आस,
जैसे तूने सिखाया जीने का विश्वास।
तेरी छाया में बढ़कर बना हूँ इंसान,
तेरे कारण ही मिला जीवन को सम्मान।
ये कलम, ये शब्द, ये सोच और ये माया,
हर रचना में मैंने तेरा ही अक्स पाया।
पिता का ऋण चुकाना आसान नहीं होता,
उसका मोल किसी तराज़ू में नहीं होता।
मैंने तो बस शब्दों का एक दीप जला दिया,
तेरे उपकारों को कविता में सजा दिया।
जो कुछ हूँ आज, उसमें तेरा ही योगदान है,
मेरी हर सफलता में तेरा सम्मान है।
इस जीवन की हर उपलब्धि, हर उड़ान,
समर्पित है तुझको — तू ही मेरा अभिमान।
— गौतम झा
पिता का ऋण
इस कलम से जो लिखा, वो तेरी कहानी है,
मौन त्याग, मर्म और प्रेम की निशानी है।
नाराज़गी कम, अपनापन बेमिसाल,
पिता है तू, जैसे पर्वत-सा विशाल।
जैसे ढलती शाम में उम्मीद का सवेरा,
हर कठिन मोड़ पर मिला है साथ तेरा।
सूरज ढल जाए, पर तू नहीं हारता,
हर चुनौती में मुझे नया आकार देता।
तूने जो बोए थे संस्कारों के बीज,
आज भी महकते हैं मेरे हर निर्णय में।
जीवन की राहों पर जब भी हुआ अँधेरा,
तेरी सीख ने बनकर दीपक रास्ता घेरा।
जब थामा था तूने मेरा नन्हा-सा हाथ,
तभी समझे मैंने दुनिया के हर जज़्बात।
तेरी छाया जैसे कोई पावन धाम,
जहाँ सुकून मिले हर सुबह और हर शाम।
तेरी सीखें हैं अनमोल धरोहर मेरी,
सहेज कर रखी हैं बातें तेरी-मेरी।
इस कागज़ पर उतरी मेरी हर आस,
जैसे तूने सिखाया जीने का विश्वास।
तेरी छाया में बढ़कर बना हूँ इंसान,
तेरे कारण ही मिला जीवन को सम्मान।
ये कलम, ये शब्द, ये सोच और ये माया,
हर रचना में मैंने तेरा ही अक्स पाया।
पिता का ऋण चुकाना आसान नहीं होता,
उसका मोल किसी तराज़ू में नहीं होता।
मैंने तो बस शब्दों का एक दीप जला दिया,
तेरे उपकारों को कविता में सजा दिया।
जो कुछ हूँ आज, उसमें तेरा ही योगदान है,
मेरी हर सफलता में तेरा सम्मान है।
इस जीवन की हर उपलब्धि, हर उड़ान,
समर्पित है तुझको — तू ही मेरा अभिमान।
— गौतम झा
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