कुछ प्रेम कहे नहीं जाते। वे ऋतुओं की तरह आते हैं, जीवन को चुपचाप बदल देते हैं, और समय बीतने के बाद भी प्रकाश बनकर साथ रहते हैं।
तुमसे ही ऋतु, तुमसे ही प्रकाश
वर्षों ने
हमारे आँगन में
ऋतुओं के असंख्य दीप जलाए हैं।
कभी सावन ने
तुम्हारी हँसी को
भीगी पत्तियों पर टाँक दिया,
कभी शीत ने
तुम्हारे मौन को
धूप की गरम चादर ओढ़ा दी।
हमने प्रेम को
कभी ऊँचे स्वर में नहीं पुकारा,
वह तो
हर सुबह की पहली किरण बनकर
खिड़की से भीतर उतरता रहा,
और हर संध्या
थके हुए आकाश की आँखों में
एक शांत विश्वास बनकर ठहरता रहा।
तुम साथ थे
तो रास्ते केवल दूरी नहीं रहे,
वे प्रार्थनाएँ बन गए,
जिन्हें पाँव नहीं,
विश्वास तय करता है।
तुम साथ थीं
तो घर केवल दीवारों का नाम नहीं रहा,
वह तुलसी की गंध,
दीपक की लौ,
और प्रतीक्षा में मुस्कुराते द्वार का
दूसरा नाम बन गया।
यदि जीवन
एक नदी है,
तो तुम्हारा प्रेम
उसका वह नील आकाश है,
जो हर लहर को
अपना प्रतिबिंब देकर
अर्थ प्रदान करता है।
यदि समय
एक वृक्ष है,
तो हमारे साथ बिताए वर्ष
उसकी शाखों पर बैठे वे पक्षी हैं,
जो हर प्रभात
एक नए गीत में बदल जाते हैं।
और जब
समय अपनी अंतिम संध्या का दीप जलाएगा,
तब भी
हमारे प्रेम का उजाला
किसी स्मृति में नहीं,
किसी कविता में नहीं,
एक-दूसरे की आत्मा में
ऋतु बनकर,
प्रकाश बनकर,
अनन्त बना रहेगा।
- -गौतम झा
तुमसे ही ऋतु, तुमसे ही प्रकाश
वर्षों ने
हमारे आँगन में
ऋतुओं के असंख्य दीप जलाए हैं।
कभी सावन ने
तुम्हारी हँसी को
भीगी पत्तियों पर टाँक दिया,
कभी शीत ने
तुम्हारे मौन को
धूप की गरम चादर ओढ़ा दी।
हमने प्रेम को
कभी ऊँचे स्वर में नहीं पुकारा,
वह तो
हर सुबह की पहली किरण बनकर
खिड़की से भीतर उतरता रहा,
और हर संध्या
थके हुए आकाश की आँखों में
एक शांत विश्वास बनकर ठहरता रहा।
तुम साथ थे
तो रास्ते केवल दूरी नहीं रहे,
वे प्रार्थनाएँ बन गए,
जिन्हें पाँव नहीं,
विश्वास तय करता है।
तुम साथ थीं
तो घर केवल दीवारों का नाम नहीं रहा,
वह तुलसी की गंध,
दीपक की लौ,
और प्रतीक्षा में मुस्कुराते द्वार का
दूसरा नाम बन गया।
यदि जीवन
एक नदी है,
तो तुम्हारा प्रेम
उसका वह नील आकाश है,
जो हर लहर को
अपना प्रतिबिंब देकर
अर्थ प्रदान करता है।
यदि समय
एक वृक्ष है,
तो हमारे साथ बिताए वर्ष
उसकी शाखों पर बैठे वे पक्षी हैं,
जो हर प्रभात
एक नए गीत में बदल जाते हैं।
और जब
समय अपनी अंतिम संध्या का दीप जलाएगा,
तब भी
हमारे प्रेम का उजाला
किसी स्मृति में नहीं,
किसी कविता में नहीं,
एक-दूसरे की आत्मा में
ऋतु बनकर,
प्रकाश बनकर,
अनन्त बना रहेगा।
- -गौतम झा
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