क्या मनुष्य का जीवन केवल भावनाओं से चलता है, या अभाव और प्रभाव भी उसकी दिशा तय करते हैं? 'त्रिधारा: जीवन का अंतर्द्वंद्व' इन्हीं तीन शक्तियों के बीच छिपे जीवन के गहरे सत्य को खोजने का एक काव्यात्मक प्रयास है।
त्रिधारा
मन के आदिम मरुस्थल में, अंकुर तीन पनपते हैं,
इन्हीं तंतुओं में उलझ-सुलझ, मानव जीवन चलते हैं।
एक प्यास है, एक तृप्ति है, एक दर्प की छाया है,
भाव, अभाव और प्रभाव ने, कैसा जाल बिछाया है।
जहाँ भाव का निर्झर फूटा, वहाँ सृष्टि मुस्काती है,
हृदयों को हृदयों से जोड़, यह संवेदना कहलाती है।
भाव बिना चेतना सूनी हो, संबंध सभी निष्प्राण रहें,
इसी डोर से बंधकर हम, हँसते, रोते, गीत कहें।
पर जब भाव उमड़ पड़ते हैं, संतुलन कहीं खो जाता है,
अपेक्षाओं का बोझ लिए, मन भीतर ही घबराता है।
ममता जब बंधन बन जाए, पीड़ा का कारण बनती है,
मन की अंधी चाहत अक्सर, अपनी राह भटकाती है।
जब जीवन-पथ पर अभावों का, घना कुहासा छा जाता है,
तब स्वार्थ और सहअस्तित्व का, अनूठा संबंध बन जाता है।
अभाव ही एकाकी जन को, समाज की ओर बुलाता है,
मदद की खातिर बढ़ा हुआ कर, मानव को मानव बनाता है।
अभाव ही आविष्कारों का, प्रथम प्रेरणा-स्रोत रहा,
इसी से श्रम का मूल्य बढ़ा, इसी से संगठन जन्मा।
पर रिक्तता जब सीमा लाँघे, और आशा क्षीण हो जाती है,
तब जीवन की नीरव वेदना, अंतहीन व्यथा कहलाती है।
जब भाव मिला, अभाव मिटा, तब तीसरी चाह जगती है,
प्रभाव स्थापित करने की आकांक्षा भीतर पलती है।
अहम् के इस सूक्ष्म जाल को, प्रभाव निरंतर सींचता है,
स्वयं को केंद्र मान मनुष्य, जग को अपने इर्द-गिर्द खींचता है।
यह प्रभाव दे पद-प्रतिष्ठा, यश, वैभव और सम्मान भी,
पर अक्सर इसके आकर्षण में खो जाता है आत्मज्ञान भी।
और यही अंततः छीन लेता, मन की सहज सरलता को,
दर्प की धधकती अग्नि मिटा दे, अंतर्मन की निर्मलता को।
ये तीनों जीवन के आधार, ये तीनों जीवन की परीक्षा हैं,
इनके संतुलित समन्वय में ही, अस्तित्व की सच्ची दीक्षा है।
भाव में करुणा, अभाव में श्रम, प्रभाव में संयम लाना है,
जो इन तीनों के पार देख ले, उसने ही सत्य को जाना है।
— गौतम झा
त्रिधारा
मन के आदिम मरुस्थल में, अंकुर तीन पनपते हैं,
इन्हीं तंतुओं में उलझ-सुलझ, मानव जीवन चलते हैं।
एक प्यास है, एक तृप्ति है, एक दर्प की छाया है,
भाव, अभाव और प्रभाव ने, कैसा जाल बिछाया है।
जहाँ भाव का निर्झर फूटा, वहाँ सृष्टि मुस्काती है,
हृदयों को हृदयों से जोड़, यह संवेदना कहलाती है।
भाव बिना चेतना सूनी हो, संबंध सभी निष्प्राण रहें,
इसी डोर से बंधकर हम, हँसते, रोते, गीत कहें।
पर जब भाव उमड़ पड़ते हैं, संतुलन कहीं खो जाता है,
अपेक्षाओं का बोझ लिए, मन भीतर ही घबराता है।
ममता जब बंधन बन जाए, पीड़ा का कारण बनती है,
मन की अंधी चाहत अक्सर, अपनी राह भटकाती है।
जब जीवन-पथ पर अभावों का, घना कुहासा छा जाता है,
तब स्वार्थ और सहअस्तित्व का, अनूठा संबंध बन जाता है।
अभाव ही एकाकी जन को, समाज की ओर बुलाता है,
मदद की खातिर बढ़ा हुआ कर, मानव को मानव बनाता है।
अभाव ही आविष्कारों का, प्रथम प्रेरणा-स्रोत रहा,
इसी से श्रम का मूल्य बढ़ा, इसी से संगठन जन्मा।
पर रिक्तता जब सीमा लाँघे, और आशा क्षीण हो जाती है,
तब जीवन की नीरव वेदना, अंतहीन व्यथा कहलाती है।
जब भाव मिला, अभाव मिटा, तब तीसरी चाह जगती है,
प्रभाव स्थापित करने की आकांक्षा भीतर पलती है।
अहम् के इस सूक्ष्म जाल को, प्रभाव निरंतर सींचता है,
स्वयं को केंद्र मान मनुष्य, जग को अपने इर्द-गिर्द खींचता है।
यह प्रभाव दे पद-प्रतिष्ठा, यश, वैभव और सम्मान भी,
पर अक्सर इसके आकर्षण में खो जाता है आत्मज्ञान भी।
और यही अंततः छीन लेता, मन की सहज सरलता को,
दर्प की धधकती अग्नि मिटा दे, अंतर्मन की निर्मलता को।
ये तीनों जीवन के आधार, ये तीनों जीवन की परीक्षा हैं,
इनके संतुलित समन्वय में ही, अस्तित्व की सच्ची दीक्षा है।
भाव में करुणा, अभाव में श्रम, प्रभाव में संयम लाना है,
जो इन तीनों के पार देख ले, उसने ही सत्य को जाना है।
— गौतम झा
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