जब देश आर्थिक संकट के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था, तब एक शांत स्वभाव वाले अर्थशास्त्री ने बिना शोर मचाए भारत की दिशा बदल दी। 'मौन की गूंज: सरदार का ऐतिहासिक सफर' उसी नेतृत्व, दूरदृष्टि और कर्म की कहानी को कविता के माध्यम से श्रद्धांजलि देता है।
मौन की गूंज
जो कहते थे वह मौन रहा,
इतिहास बताना भूल गए,
वे संकट की काली रातें,
वे दृश्य पुराने भूल गए।
जब खाड़ी युद्ध की लपटों ने,
विश्व बाज़ार को हिलाया था,
आर्थिक संकट के भँवर में,
भारत भी डगमगाया था।
तिजोरी लगभग खाली थी,
संसाधनों का अभाव था,
सोना तक गिरवी रखना पड़ा,
हर ओर कठिन प्रभाव था।
तब एक अर्थशास्त्री आया,
जिसने कोई शोर न मचाया,
न नारों का सहारा लिया,
न झूठा सपना दिखलाया।
सन इक्यानबे का वह दौर,
जब संकट ने ललकारा था,
मनमोहन ने अपनी नीति से,
भारत का भाग्य संवारा था।
लाइसेंस राज की जंजीरों को,
जिसने साहस से तोड़ दिया,
बदलते वैश्विक दौर के संग,
भारत का रथ मोड़ दिया।
शोर और कर्म का अंतर
जिसे कभी “मौन” कहकर,
लोग उपहास में पुकारते थे,
वह बंद कमरों की बैठकों में,
राष्ट्र की नींव संवारते थे।
जब दो हजार आठ की मंदी ने,
दुनिया भर को झकझोरा था,
तब दूरदृष्टि और संतुलन ने,
भारत को संभाल कर रखा था।
नीतियाँ बनीं कवच की तरह,
ज्ञान बना उसका बल था,
दुनिया जहाँ डगमगा रही थी,
भारत वहीं अटल था।
शोर मचाना स्वभाव नहीं था,
उस कर्मयोगी इंसान का,
वह मौन रहा पर काम बोलता,
यही परिचय था सम्मान का।
दस वर्षों के नेतृत्व में,
अर्थव्यवस्था ने उड़ान भरी,
विकास, अधिकार और कल्याण की,
नई-नई राहें भी उभरीं।
सूचना का अधिकार हो चाहे,
या ग्रामीण रोजगार का मान,
जनता को सशक्त बनाने का,
रहा निरंतर उसका अभियान।
जब लुट गया गाँव...
आज जब चुनौतियों के साये,
फिर अर्थव्यवस्था पर छाते हैं,
महँगाई, बेरोज़गारी जैसे प्रश्न,
हर दिन नए रूप में आते हैं।
तब याद तुम्हारी आती है,
वह धीर-गंभीर चेहरा प्यारा,
जिसने बिना शोर मचाए ही,
डूबती कश्ती को दिया किनारा।
"गूंगा नहीं, वह बस मौन था,
जब लुट गया गाँव, तब याद आया सरदार कौन था।"
भाषणों से पेट नहीं भरता,
न नारों से राष्ट्र महान बने,
इतिहास गवाही देता है कि,
कर्म ही स्थायी पहचान बने।
आलोचक थककर लौट गए,
पर कद उसका माप न सके,
वह शांत समंदर जैसा था,
जो आने वाले तूफ़ान भाँप सके।
— गौतम झा
मौन की गूंज
जो कहते थे वह मौन रहा,
इतिहास बताना भूल गए,
वे संकट की काली रातें,
वे दृश्य पुराने भूल गए।
जब खाड़ी युद्ध की लपटों ने,
विश्व बाज़ार को हिलाया था,
आर्थिक संकट के भँवर में,
भारत भी डगमगाया था।
तिजोरी लगभग खाली थी,
संसाधनों का अभाव था,
सोना तक गिरवी रखना पड़ा,
हर ओर कठिन प्रभाव था।
तब एक अर्थशास्त्री आया,
जिसने कोई शोर न मचाया,
न नारों का सहारा लिया,
न झूठा सपना दिखलाया।
सन इक्यानबे का वह दौर,
जब संकट ने ललकारा था,
मनमोहन ने अपनी नीति से,
भारत का भाग्य संवारा था।
लाइसेंस राज की जंजीरों को,
जिसने साहस से तोड़ दिया,
बदलते वैश्विक दौर के संग,
भारत का रथ मोड़ दिया।
शोर और कर्म का अंतर
जिसे कभी “मौन” कहकर,
लोग उपहास में पुकारते थे,
वह बंद कमरों की बैठकों में,
राष्ट्र की नींव संवारते थे।
जब दो हजार आठ की मंदी ने,
दुनिया भर को झकझोरा था,
तब दूरदृष्टि और संतुलन ने,
भारत को संभाल कर रखा था।
नीतियाँ बनीं कवच की तरह,
ज्ञान बना उसका बल था,
दुनिया जहाँ डगमगा रही थी,
भारत वहीं अटल था।
शोर मचाना स्वभाव नहीं था,
उस कर्मयोगी इंसान का,
वह मौन रहा पर काम बोलता,
यही परिचय था सम्मान का।
दस वर्षों के नेतृत्व में,
अर्थव्यवस्था ने उड़ान भरी,
विकास, अधिकार और कल्याण की,
नई-नई राहें भी उभरीं।
सूचना का अधिकार हो चाहे,
या ग्रामीण रोजगार का मान,
जनता को सशक्त बनाने का,
रहा निरंतर उसका अभियान।
जब लुट गया गाँव...
आज जब चुनौतियों के साये,
फिर अर्थव्यवस्था पर छाते हैं,
महँगाई, बेरोज़गारी जैसे प्रश्न,
हर दिन नए रूप में आते हैं।
तब याद तुम्हारी आती है,
वह धीर-गंभीर चेहरा प्यारा,
जिसने बिना शोर मचाए ही,
डूबती कश्ती को दिया किनारा।
"गूंगा नहीं, वह बस मौन था,
जब लुट गया गाँव, तब याद आया सरदार कौन था।"
भाषणों से पेट नहीं भरता,
न नारों से राष्ट्र महान बने,
इतिहास गवाही देता है कि,
कर्म ही स्थायी पहचान बने।
आलोचक थककर लौट गए,
पर कद उसका माप न सके,
वह शांत समंदर जैसा था,
जो आने वाले तूफ़ान भाँप सके।
— गौतम झा
Leave a Comment