अंततः... एक शाश्वत सत्य

अंततः... एक शाश्वत सत्य

हर त्याग हार नहीं होता; कुछ बिछड़नें ही जीवन के सबसे गहरे प्रेम, मर्यादा और शाश्वत सत्य को जन्म देती हैं।

एक शाश्वत सत्य

अंततः राम त्याग ही देते हैं सीता को,
कर्तव्य की वेदी पर, मर्यादा की प्रीत को।
हृदय रोता है भीतर, आँखें मौन रहती हैं,
पर इतिहास की धाराएँ बस यही कहती हैं।

अंततः कृष्ण त्याग ही देते हैं राधा को,
पीछे छोड़ जाते हैं वो जमुना के तीर को।
बांसुरी की तान कहीं शून्य में खो जाती है,
राजधर्म के आगे प्रीत अधूरी रह जाती है।

अंततः सत्य त्याग ही देता है माया को,
भ्रम के पर्दे हटाकर, पहचानता है काया को।
संसार के सब रंग फीके पड़ जाते हैं,
जब सत्य के उजाले जीवन में आते हैं।

अंततः आत्मा त्याग ही देती है शरीर को,
तोड़कर इस नश्वर संसार की जंजीर को।
जिस काया को संवारा था पल-पल जतन से,
वह भी छूट जाती है एक दिन इस बंधन से।

अंततः हम त्याग ही देते हैं, अनजाने में,
हर उस अनमोल रत्न को इस ज़माने में
जिसे हमने शिद्दत से, अपनी जान से चाहा था,
जिसके लिए कभी यह सारा जग सराहा था।

समय की धूल सब कुछ धुंधला कर देती है,
हँसती हुई आँखों को अश्कों से भर देती है।
पाने और खोने का यह खेल पुराना है,
हर मुसाफ़िर को एक दिन लौट जाना है।

और अंततः... हम त्याग ही देते हैं उन शब्दों को,
जो दबा रखे थे दिल में, उन अनकहे जज़्बों को।
जिन्हें हम कहना चाहते थे बड़ी बेताबी से,
पर वे दफ़्न हो गए वक़्त की ख़ामोशी से।

रह जाती है बस एक अंतहीन-सी कसक,
धुंधली पड़ जाती है यादों की वह चमक।
यह जीवन भी तो एक सुंदर-सा त्याग है,
विदाई के सुर में छिपा गहरा कोई राग है।

गौतम झा

 

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