कागज़ और नागरिकता

कागज़ और नागरिकता

यह कविता प्रशासनिक असमंजस, नागरिकों की उलझन और नागरिकता की पहचान से जुड़े बुनियादी सवालों को स्वर देती है।

नागरिकता

हाथ में लेकर खड़े हैं हम प्रमाण-पत्र कई,
पर सवाल उठा है ऐसा, उलझन है नई।
यह आधार, यह पैन कार्ड, यह वोटर की पर्ची,
क्या बयां नहीं करती है अब हमारी मर्ज़ी?

जिस पासपोर्ट पर छपा है भारत का वो मान,
कहा जा रहा कि वह तो बस है एक पहचान।
सफ़र का वो साधन है, सरहद पार जाने को,
काफ़ी नहीं है वो वतन का हक जताने को!

जिसको खुद सरकार ने जांच कर है ढाला,
पुलिस की तस्दीक के बाद ही निकाला।
अगर वही दस्तावेज़ नागरिकता का गवाह नहीं,
तो आम शहरी के पास फिर बची कोई राह नहीं।

एक टैक्स भरता है, एक वोट देने जाता है,
पर असली सनद क्या है, कोई समझ पाता है।
एक्ट-1955 की कानूनन ये गहराई,
क्या आम आदमी को कभी समझ में है आई?

यह राजनीति का नहीं, प्रशासनिक ये फेर है,
भरोसे और यकीं का ये गहरा सा अंधेर है।
दशकों से जिस कागज़ को सीने से लगाया है,
आज उसे महज़ एक सफ़रनामा बताया है।

दिखा दिया सब कुछ, जो भी पास हमारे था,
हर एक सरकारी दफ्तर का जो सहारा था।
अब साफ़-साफ़ कोई आकर हमें ये बतलाए,
कि इस देश का वासी खुद को कैसे साबित कर पाए?

 — गौतम झा

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