जंतर-मंतर की तपती सड़क और एक अडिग इंसान...

जंतर-मंतर की तपती सड़क और एक अडिग इंसान...

जब सत्ता मौन हो जाती है, तब कभी-कभी एक भूखा इंसान पूरे देश की सबसे बुलंद आवाज़ बन जाता है।

जंतर-मंतर और एक अडिग इंसान

मुझे एसी कमरों में बैठकर नीतियों पर बहस करने वाले नहीं,
जंतर-मंतर की तपती सड़क पर, युवाओं के अधिकारों के लिए अडिग खड़ा इंसान पसंद है।

मुझे नहीं भाते वे चेहरे,
जो देश के भविष्य की चीखें सुनकर भी खामोश रहते हैं।
मुझे तो न्याय की आस में,
लंबे अनशन पर बैठा वह प्रहरी पसंद है।

मुझे अपनी साख बचाने वाली चालाक सरकारें नहीं भातीं,
मुझे तो बच्चों के सपनों की खातिर,
अपनी जान दांव पर लगाता वह फकीर पसंद है।

जिसका शरीर हर गुजरते दिन के साथ क्षीण होता जा रहा है,
पर जिसका संकल्प आज भी हिमालय की तरह अटल और अडिग है।

मुझे नहीं भाती वह व्यवस्था,
जो पेपर लीक और घोटालों पर आंखें मूंद लेती है।
मुझे तो उसी व्यवस्था की अंतरात्मा को झकझोरती,
सच की निर्भीक हुंकार पसंद है।

जो केवल पहाड़ों को बचाना नहीं जानता,
वह दिल्ली के शोर में
लाखों छात्रों के टूटते सपनों की भी रखवाली करना जानता है।

मुझे नहीं भाते वे लोग,
जो भूख हड़ताल को महज एक तमाशा समझते हैं।
मुझे पसंद है वह अडिग जिद,
जो गिरती सांसों के बीच भी बदलाव का इतिहास लिख रही है।

हाँ, मुझे इस समय पूरी दुनिया में,
जंतर-मंतर पर मौन और उपवास से
सबसे बुलंद आवाज़ उठाता...

सोनम वांगचुक पसंद है।

 -गौतम झा

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