सीमा के पार: प्रेम की अनंत यात्रा

सीमा के पार: प्रेम की अनंत यात्रा

क्या प्रेम सचमुच हर सीमा से परे होता है? 'सीमा के पार' एक ऐसी कविता है, जहाँ प्रेम समय, दूरी और कायनात की हर हद को पार कर जाता है।

सीमा के पार

यदि तुम रात हो,
तो मैं तुम्हारे लिए एक तारा बन जाना चाहूँगा।

यदि तुम समंदर हो,
तो मैं तुम्हारी लहरों में विलीन हो जाना चाहूँगा।

यदि तुम खामोशी हो,
तो मैं तुम्हारा अनकहा लफ़्ज़ बन जाना चाहूँगा।

यदि तुम सहरा की तपती धूप हो,
तो मैं तुम्हारे लिए शीतल छाँव बन जाना चाहूँगा।

यदि तुम बहती नदी हो,
तो मैं तुम्हारा अडिग किनारा बन जाना चाहूँगा।

यदि तुम सूखी शाख हो,
तो मैं वसंत का पहला हरा पत्ता बन जाना चाहूँगा।

यदि तुम कोई अधूरा ख़्वाब हो,
तो मैं उसे मुकम्मल करने वाली हक़ीक़त बन जाना चाहूँगा।

यदि तुम दर्द की कोई टीस हो,
तो मैं तुम्हारा मरहम बन जाना चाहूँगा।

और मैं प्रेम करता रहूँगा तुमसे,
ख़्वाबों में,
यादों में,
हर दुआ में,
हर साँस में,
और इस कायनात की हर सीमा के पार।

 

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