भूख का शंखनाद: जंतर-मंतर का सत्याग्रह

भूख का शंखनाद: जंतर-मंतर का सत्याग्रह

जब शब्द मौन हो जाएँ, तब भूख शंखनाद बन जाती है। पढ़िए सोनम वांगचुक के संघर्ष, शिक्षा में न्याय और युवाओं के भविष्य को समर्पित यह ओजपूर्ण हिंदी कविता।

भूख का शंखनाद

जिस लद्दाख की बर्फ़ से निकला,
वह शांत मगर तूफ़ान है।
होंठ भले ही मौन खड़े हों,
रग-रग में उसके इंकलाब है।

जिसने पहाड़ों को जीना सिखाया,
बर्फ़ से जल का स्वप्न गढ़ा,
वही सच्चा शिक्षक आज
जंतर-मंतर पर सत्य से अड़ा।

अठारह-बीस दिन बीत चुके,
तन अब क्षीण, थका-सा है,
पर आँखों में जलती जो लौ,
अब भी उतनी प्रखर खड़ी है।

अन्न की इच्छा, सुख की चाह,
बस एक प्रण निभाना है,
इस देश के हर नौजवान का
भविष्य बचाना है।

भ्रष्टाचार की दीमक ने
शिक्षा की नींव हिला दी है,
सपनों के सौदागरों ने
बच्चों की तक़दीर जला दी है।

पेपर लीक के इस बाज़ार में
मेहनत कौड़ियों में बिकती है,
अंधी-बहरी इस व्यवस्था में
हर उम्मीद सिसकती है।

पर जब तक ऐसा साधक है,
यह देश कभी हारेगा,
वह मौन रहकर भी देखो,
सिंहासन को ललकारेगा।

देश के वीरों, जाग उठो,
उस बूढ़े तन की पीर सुनो,
जो भूखा रहकर लड़ता है,
उसकी खामोश पुकार सुनो।

यह भूख नहीं, यह विद्रोह है,
अन्याय के विरुद्ध हुंकार है,
सोनम की गिरती हर साँस
सोए ज़मीर की पुकार है।

सत्य झुकेगा नहीं कभी,
अन्याय का एक दिन हार होगा।
जो अपने हक़ की लड़ाई लड़े,
भविष्य उसी का संसार होगा।

 -गौतम झा

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