अंदर का अंधा नशा

अंदर का अंधा नशा

क्या हम होश में हैं, या अपने ही बनाए नशों में डूबे हैं?

नशा

हमारे नशे कड़े हैं
शराब से भी ज़्यादा,
क्योंकि ये उतरते नहीं।

भ्रम का नशा
आँखें खुली,
सच गायब।
हम इतिहास नहीं पढ़ते,
उसे अपने हिसाब से लिखते हैं।

सम्प्रदाय का नशा
ईश्वर पीछे छूट जाता है,
नाम आगे चल पड़ते हैं।
प्रार्थनाएँ नहीं टकरातीं,
हम टकरा देते हैं।

जाति का नशा
जन्म ही फ़ैसला बन जाता है,
जीवन गवाही देता रह जाता है।
रक्त में कोई भेद नहीं,
भेद हमारी नज़र में है।

और सबसे खतरनाक
पवित्र होने का नशा।
यह शोर नहीं करता,
पर भीतर सब जला देता है।

हम नशे में नहीं दिखते
हम सामान्य दिखते हैं।
यही इसकी सबसे बड़ी चाल है।

कोई गिरता नहीं,
फिर भी सब नीचे हैं।
कोई टूटा नहीं,
फिर भी सब बिखरे हैं।

शायद होश यही है
कि एक दिन
आईना सवाल करे,
और हम जवाब दे पाएं।

कि जो दिख रहा है
वह मैं हूँ,
या मेरे नशों का चेहरा।

 -गौतम झा

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