जब आदर्श सिर्फ दीवारों पर रह जाते हैं और सच तस्वीरों के पीछे छिप जाता है, तब इंसान का असली चेहरा सबसे ज़्यादा चीखता है।
तस्वीर की ओट
रात के गहरे सन्नाटे में, जब सो जाता है जग सारा,
एक जीव रेंगता सतरों पर, ढूँढता अपना हर निवाला।
हज़ारों क़त्ल किए उसने, तृप्त हुई जब उसकी भूख,
लहू से सने उन पंजों की, मिटती नहीं कभी भी बू।
पर देखो तमाशा दुनिया का!
ज्यों ही सूरज की पहली किरण, खिड़की से भीतर आती है,
वही छिपकली डर के मारे, सहसा ही छिप जाती है।
कहाँ छिपी? उस कोने में, जहाँ ‘महापुरुष’ का वास है,
अहिंसा की उस मूरत के पीछे, हिंसा का उपहास है।
यही आइना है आज के मानस का—
दिन भर जो छल-कपट बुनता, और झूठ का व्यापार करे,
अंधेरे की चादर ओढ़कर, मानवता पर वार करे।
वही शख्स फिर सुबह सवेरे, तिलक लगाकर निकलता है,
आदर्शों की भारी बातों में, अपना चेहरा बदलता है।
दीवारों पर टाँग रखे हैं, बुद्ध, गांधी और विवेकानंद,
पर भीतर के उस रावण को, बाँध सका न कोई बंधन।
बाहर माला फेर रहा है, भीतर षड्यंत्रों का जाल,
तस्वीरों के पीछे छिपकर, चलता है हर खोटी चाल।
चरित्र का यह दोहरापन—
मूर्तियों से वो माफ़ी माँगे, पर नियत में न सुधार करे,
महापुरुष बस ढाल बने हैं, ताकि वो फिर से वार करे।
ऐ इंसान! ज़रा ये सोच—ये ओट कहाँ तक काम आएगी?
जब तस्वीर हटेगी दीवार से, तो असलियत ही चिल्लाएगी।
— गौतम झा
तस्वीर की ओट
रात के गहरे सन्नाटे में, जब सो जाता है जग सारा,
एक जीव रेंगता सतरों पर, ढूँढता अपना हर निवाला।
हज़ारों क़त्ल किए उसने, तृप्त हुई जब उसकी भूख,
लहू से सने उन पंजों की, मिटती नहीं कभी भी बू।
पर देखो तमाशा दुनिया का!
ज्यों ही सूरज की पहली किरण, खिड़की से भीतर आती है,
वही छिपकली डर के मारे, सहसा ही छिप जाती है।
कहाँ छिपी? उस कोने में, जहाँ ‘महापुरुष’ का वास है,
अहिंसा की उस मूरत के पीछे, हिंसा का उपहास है।
यही आइना है आज के मानस का—
दिन भर जो छल-कपट बुनता, और झूठ का व्यापार करे,
अंधेरे की चादर ओढ़कर, मानवता पर वार करे।
वही शख्स फिर सुबह सवेरे, तिलक लगाकर निकलता है,
आदर्शों की भारी बातों में, अपना चेहरा बदलता है।
दीवारों पर टाँग रखे हैं, बुद्ध, गांधी और विवेकानंद,
पर भीतर के उस रावण को, बाँध सका न कोई बंधन।
बाहर माला फेर रहा है, भीतर षड्यंत्रों का जाल,
तस्वीरों के पीछे छिपकर, चलता है हर खोटी चाल।
चरित्र का यह दोहरापन—
मूर्तियों से वो माफ़ी माँगे, पर नियत में न सुधार करे,
महापुरुष बस ढाल बने हैं, ताकि वो फिर से वार करे।
ऐ इंसान! ज़रा ये सोच—ये ओट कहाँ तक काम आएगी?
जब तस्वीर हटेगी दीवार से, तो असलियत ही चिल्लाएगी।
— गौतम झा