एक नदी, दो किनारे
एक नदी के दो किनारे,
समानांतर अपने पथ पर अग्रसर।
उन्मुक्त धाराओं की अटखेलियों से मुग्ध,
स्पर्श से वंचित,
फिर भी साथ चलने को अभिशप्त।
एक ही अस्तित्व के दो संरक्षक,
ज्ञात और अज्ञात की
विषम संवेदनाओं को समेटे।
इच्छाओं के आलोक से ज्योतिर्मय,
संभावनाओं की तरह सतर्क,
प्रकृति के मौन विधान में अविचल।
प्रस्फुटित भावों का अरण्य,
मानस-पटल के कैनवास पर
निरंतर उभरते परिप्रेक्ष्य।
योजनाविहीन आकांक्षाएँ,
भीष्म-से धराशायी संकल्प,
और स्मृतियों का अनंत विस्तार।
सुरक्षा-कवच के अदृश्य कक्ष में,
प्रतिपल, निरंतर,
हठीली धारा की तरह बहता
एक मुक्त आनंद।
दो किनारे...
साथ भी,
अलग भी।
एक नदी।
-गौतम झा
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