मोहब्बत कभी वादा करके नहीं आती, वह बस आती है और अधूरी कहानी को एक खूबसूरत शुरुआत में बदल देती है।
तुम और हम
हम सिखा देंगे तुम्हें राह वही,
राह तो राह है, चलना भी तुम्हें होगा कभी।
कितने अफ़साने यहाँ अनसुने रह गए,
हम सुनाएँगे वो किस्से जो रहे अनकहे सभी।
दिल के अरमानों को पंख लगे तेरे आने से,
जज़्बातों की हवा भी अबकी कुछ ऐसी बही।
तेरी आहट से महकने लगा है दिल का चमन,
वरना वीरान थी ये दुनिया, ख़ामोश थी हर गली।
तेरे आने से बदलने लगे हैं मौसम भी,
धूप थी आँखों में, अब छाँव है कुछ-कुछ मिली।
जो अधूरी-सी कहानी थी मेरे जीवन की,
तेरे आने से मिली उसको नई ज़िंदगी।
कुछ तो होगा सबब तुमसे यूँ मिल जाने का,
कौन जाने, हमें मिलाया किसने और क्यों सही।
तुम मिले तो लगा जैसे कोई दुआ कबूल हुई,
जैसे मुद्दत के बाद दिल को मिली हो बंदगी।
हमने चाहा था जिसे, वह मुकम्मल हो न सका,
तुम मिले तो हर कमी लगने लगी कुछ कम ही।
कभी ख़ामोश रहो, फिर भी बात होती है,
तेरी ख़ामोशी में सुनता हूँ मैं आवाज़ सभी।
तुम्हारी आँखों में जाने कितने मौसम हैं,
कभी सावन की फुहार, कभी तपती दोपहरी।
तुमसे मिलकर ये जाना कि मोहब्बत क्या है,
वरना दुनिया तो मिली थी मगर दुनिया थी सभी।
कुछ रिश्ते नाम के मोहताज नहीं होते,
दिल से जुड़ जाएँ तो बन जाते हैं उम्रभर की ख़ुशी।
मिल गया जैसे किसी मुसाफ़िर को अपना मुकाम,
तुम जो आए, मेरे दामन में खुशियाँ ही खुशियाँ रही।
अब न मंज़िल की तमन्ना, न सफ़र का कोई ग़म,
तुम अगर साथ रहो, तो हर राह लगे अपनी ही।
ज़िंदगी तुमसे मिली है तो इसे सँवारेंगे,
तुम रहो पास तो हर साँस लगे एक नई ज़िंदगी।
कभी बिछड़ने की बात दिल में न लाना तुम,
तुमसे जुड़ी है मेरी हर सुबह, मेरी हर शाम भी।
हम जहाँ भी रहें, साथ तुम्हारा रहे,
यही चाहत है मेरी, यही आरज़ू आख़िरी।
तुम और हम का ये रिश्ता यूँ ही कायम रहे,
वक़्त बदले, मगर कम न हो इसकी रोशनी।
— कवि कुमार ‘प्रचंड’
तुम और हम
हम सिखा देंगे तुम्हें राह वही,
राह तो राह है, चलना भी तुम्हें होगा कभी।
कितने अफ़साने यहाँ अनसुने रह गए,
हम सुनाएँगे वो किस्से जो रहे अनकहे सभी।
दिल के अरमानों को पंख लगे तेरे आने से,
जज़्बातों की हवा भी अबकी कुछ ऐसी बही।
तेरी आहट से महकने लगा है दिल का चमन,
वरना वीरान थी ये दुनिया, ख़ामोश थी हर गली।
तेरे आने से बदलने लगे हैं मौसम भी,
धूप थी आँखों में, अब छाँव है कुछ-कुछ मिली।
जो अधूरी-सी कहानी थी मेरे जीवन की,
तेरे आने से मिली उसको नई ज़िंदगी।
कुछ तो होगा सबब तुमसे यूँ मिल जाने का,
कौन जाने, हमें मिलाया किसने और क्यों सही।
तुम मिले तो लगा जैसे कोई दुआ कबूल हुई,
जैसे मुद्दत के बाद दिल को मिली हो बंदगी।
हमने चाहा था जिसे, वह मुकम्मल हो न सका,
तुम मिले तो हर कमी लगने लगी कुछ कम ही।
कभी ख़ामोश रहो, फिर भी बात होती है,
तेरी ख़ामोशी में सुनता हूँ मैं आवाज़ सभी।
तुम्हारी आँखों में जाने कितने मौसम हैं,
कभी सावन की फुहार, कभी तपती दोपहरी।
तुमसे मिलकर ये जाना कि मोहब्बत क्या है,
वरना दुनिया तो मिली थी मगर दुनिया थी सभी।
कुछ रिश्ते नाम के मोहताज नहीं होते,
दिल से जुड़ जाएँ तो बन जाते हैं उम्रभर की ख़ुशी।
मिल गया जैसे किसी मुसाफ़िर को अपना मुकाम,
तुम जो आए, मेरे दामन में खुशियाँ ही खुशियाँ रही।
अब न मंज़िल की तमन्ना, न सफ़र का कोई ग़म,
तुम अगर साथ रहो, तो हर राह लगे अपनी ही।
ज़िंदगी तुमसे मिली है तो इसे सँवारेंगे,
तुम रहो पास तो हर साँस लगे एक नई ज़िंदगी।
कभी बिछड़ने की बात दिल में न लाना तुम,
तुमसे जुड़ी है मेरी हर सुबह, मेरी हर शाम भी।
हम जहाँ भी रहें, साथ तुम्हारा रहे,
यही चाहत है मेरी, यही आरज़ू आख़िरी।
तुम और हम का ये रिश्ता यूँ ही कायम रहे,
वक़्त बदले, मगर कम न हो इसकी रोशनी।
— कवि कुमार ‘प्रचंड’
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