शस्त्र और शास्त्र के संवाहक: भगवान परशुराम

शस्त्र और शास्त्र के संवाहक: भगवान परशुराम

धरा पर जब-जब अधर्म बढ़ता है और मर्यादा की नींव डगमगाती है, तब-तब ईश्वर किसी न किसी रूप में अवतार लेकर संतुलन स्थापित करते हैं। भगवान परशुराम इसी दिव्य परंपरा के प्रतीक हैं—जहाँ शौर्य और ज्ञान, दोनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

भगवान परशुराम

धरा पर जब-जब बढ़ा अधर्म, और कांपी मर्यादा की नींव,
तब भृगुवंश में अवतरे प्रभु, बन न्याय का सजीव प्रतीक।

रेणुका के लाडले, जमदग्नि के तेज का है जो विस्तार,
परशु हाथ में जिनके शोभित, शस्त्र-शास्त्र के वे आधार।

ब्राह्मण का तप समाहित जिनमें, क्षत्रिय सा जिनमें रण-कौशल,
अन्याय देख जो मौन बैठे, जिनका क्रोध महा-अनल।

दुष्ट आततायी का मान मर्दन कर, धर्म की ध्वजा उठाई थी,
अहंकारी राजाओं से इस वसुंधरा को मुक्ति दिलाई थी।

वे केवल योद्धा नहीं प्रखर, वे गुरुओं के भी गुरु महान,
भीष्म, द्रोण और कर्ण ने पाया, जिनसे अस्त्रों का वरदान।

महेंद्र पर्वत पर तपलीन हो, जो काल को भी देते मात,
चिरंजीवी बन आज भी करते, भक्तजनों पर अपनी कृपा-पात।

नमन है उस महापुरुष को, जो शौर्य का है असली रूप,
ज्ञान पुंज वे ब्रह्म-तेज के, और न्याय के दिव्य स्वरूप।

परशुराम जयंती पर गूँजे, फिर से उनका पावन नाम,
अधर्म मिटे और धर्म जगे, जय-जय प्रभु परशुराम!

गौतम झा

 

Stay Updated with InsightfulTake

Get insightful stories, politics, culture and analysis directly in your inbox.

Subscribe Now →

Leave a Comment