गलत-सही

गलत-सही

जब समाज हर विचार, हर रिश्ते और हर व्यक्ति को ‘सही’ और ‘गलत’ के खांचों में बाँटने लगे, तब सबसे ज़रूरी हो जाता है उन पैमानों पर सवाल उठाना। ‘गलत-सही’ एक ऐसी कविता है जो स्थापित धारणाओं को चुनौती देती है और पाठक को सोचने पर मजबूर करती है।

गलत-सही

अगर सवाल ही गलत है,
तो फिर जवाब का क्या मतलब है?

किसी का होना अगर गलत है,
तो ना होना क्यों बेगैरत है?

किसी को सोचना ही जब गलत है,
तो सामने झुठलाना क्या मतलब है?

अदालत अगर घर तोड़ सकती है,
तो वही अदालत जोड़ क्यों नहीं सकती?

सियासत ही जब पूरी गलत है,
तो फिर उम्मीद की क्या बहस है?

सब छोड़ किसी एक का होना सही है,
तो वो सबकी आँखों में क्यों चुभ रही है?

ये सही है, वो गलत है,
फिर गलत-सही, और सही-गलत;

इस आवरण की उलझन यही है,
तो फिर अनावरण का क्या दर्शन है?

— गौतम झा

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