छायादार पेड़ और सफलता

छायादार पेड़ और सफलता

छायादार पेड़ और सफलता

पेड़ को छायादार बनने में वर्षों लगते हैं,
सफलता को भी सींचने में ऐसे ही गुज़रते हैं।।

धूप, बारिश, शीत और जैविक प्रीत,
छायादार पेड़ के प्रमुख हैं कुछ रीत।।

जैविक दुर्गंध में घुटती सफलता की राह,
सुगंधित होने से पहले का अंतिम दाह।।

छाया ने पेड़ को पहचान दिया,
फल का अनोखा इनाम दिया।
सफलता ने भी प्रमाण दिया,
जीवन को आर्थिक सम्मान दिया।।

छायादार पेड़ एक बस्ती है,
चूहा, सांप और पंछी की हस्ती है।
सफलता की भी कुछ ऐसी मस्ती है,
जनजाति की प्रगति की अभिव्यक्ति है।।

पेड़ ने प्रकृति के सहयोग से फल का उत्पाद बनाया,
सफलता ने प्रयास को प्रगति का आधार बनाया।।

पेड़ हुआ पुराना, पतझड़ का आया ज़माना,
सफलता का शोर घटा, वैभवता की ओर चला।।

सांप और चूहे के कुछ उसूल हैं,
पेड़ के प्रायः प्रतिकूल हैं।
सफलता में भी छुपा एक शूल है,
वर्षों के एकांकी का एक भूल है।।

पतझड़ ने पेड़ को ज्ञान दिया,
सांप और चूहे के खेल को आम किया।
सफलता ने भी संज्ञान लिया,
आहत मन से सबकुछ जान लिया।।

फल में बेहद रस है, बस्ती का एक बरस है।
सफलता में भी असर है, प्रतिस्पर्धा का अवसर है।

रस का शोर बढ़ा, छाया को कठोर लगा,
सफलता का भोर हुआ, मोह का रोग हुआ।

पेड़ सदा अकेला रहा,
वास्तविकता से घिरा रहा।
सफलता भी बेचारा रहा,
साधन का बस सहारा रहा।।

गौतम झा

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