बेटी जीवन की वह मधुर धुन है, जो घर को केवल आबाद नहीं करती, बल्कि उसे प्रेम, उल्लास और अनगिनत सपनों से भर देती है। यह कविता एक पिता के हृदय में अपनी बेटी के लिए बसे स्नेह, गर्व और मंगलकामनाओं का कोमल प्रतिबिंब है।
बेटी
सीप-मोती सी मेरी बेटी,
नदी सी अल्हड़, पंछी सी चंचल।
सावन सी छन-छन बरसती,
सजती-सँवरती, हँसती-खिलती।
शरद-पूर्णिमा सी मधुर मुस्कान,
नित्य-नूतन अधरों पर गान।
स्नेह-सुधा में पली-बढ़ी,
नव जीवन-पथ पर बढ़ चली।
सुख ही सुख हों तेरे साथ,
उजले हों जीवन के हर पथ।
सरल, स्वच्छंद गगन-पथ हो,
उल्लास-उपवन सा जीवन हो।
बस! जल-बिंदु सी बरस निकल जाए,
तू हो वयस्क, घर स्वस्थ हो जाए।
— गौतम झा
बेटी
सीप-मोती सी मेरी बेटी,
नदी सी अल्हड़, पंछी सी चंचल।
सावन सी छन-छन बरसती,
सजती-सँवरती, हँसती-खिलती।
शरद-पूर्णिमा सी मधुर मुस्कान,
नित्य-नूतन अधरों पर गान।
स्नेह-सुधा में पली-बढ़ी,
नव जीवन-पथ पर बढ़ चली।
सुख ही सुख हों तेरे साथ,
उजले हों जीवन के हर पथ।
सरल, स्वच्छंद गगन-पथ हो,
उल्लास-उपवन सा जीवन हो।
बस! जल-बिंदु सी बरस निकल जाए,
तू हो वयस्क, घर स्वस्थ हो जाए।
— गौतम झा
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