आजकल

आजकल

आज की पीड़ा में छिपा है कल का एक ख़ूबसूरत ख़्वाब।

आजकल

नित नई इक कहानी कह रहे हैं आजकल,
सह रहे हैं दर्द कल के, पा सकें कुछ राज़ कल।

चाह कुछ भी नहीं अपनी सिवा इक हँसी,
राह जो चुनी हमने, गूँजेगी वो साज़ कल।

ज़ख़्म देना इस जहाँ की रीत है सदियों पुरानी,
मरहमों की आस रखना, छोड़ देना नाज़ कल।

कहते हैं मिटता इश्क़ का हर अक्स अब,
तू बने शाहजहाँ पहले, मिल सके मुमताज़ कल।

जो कभी आँखों में था, अब ख़्वाब में मिलता नहीं,
फिर भी दिल ढूँढ़ता रहता है वही आग़ाज़ कल।

वक़्त ने छीने बहुत चेहरे, बहुत रिश्ते मगर,
कौन जाने किसका लौट आए कोई अंदाज़ कल।

हमने ख़ामोशी को भी अपना हमसफ़र मान लिया,
क्या पता लब पर उतर आए कोई आवाज़ कल।

रात की तीरगी से डर के ठहरना क्या भला,
चाँद के हिस्से में भी तो आएगा परवाज़ कल।

आज काँटों से भरी राहों में चलना पड़ रहा,
हो सके इन पाँवों को मिल जाए गुल का ताज कल।

जिसको अपना कह के हमने उम्र भर चाहा बहुत,
वो भी शायद याद कर लेगा हमारा राज़ कल।

इश्क़ में सौ बार टूटा, फिर भी दिल टूटा नहीं,
दिल को शायद मिल ही जाए टूटने का इलाज़ कल।

आज जिन आँखों में केवल इंतज़ारों की नमी,
उनमें शायद फिर चमक उठे कोई आग़ाज़ कल।

हमने जो सच कह दिया, दुनिया ख़फ़ा होती रही,
सच की ख़ुशबू छोड़ जाएगी अपनी आवाज़ कल।

वक़्त की चौखट पे रखकर अपनी सारी आरज़ू,
देखते हैं कौन पढ़ता है दिलों का राज़ कल।

आज जो पत्थर समझकर राह में ठुकरा दिए,
हो सके वही बनें मंज़िल का कोई ताज कल।

नित नई इक कहानी कह रहे हैं आजकल,
सह रहे हैं दर्द कल के, पा सकें कुछ राज़ कल।

चाह कुछ भी नहीं अपनी सिवा इक हँसी,
राह जो चुनी हमने, गूँजेगी वो साज़ कल।

कवि कुमार "प्रचंड"

 

Stay Updated with InsightfulTake

Get insightful stories, politics, culture and analysis directly in your inbox.

Subscribe Now →

Leave a Comment