आजकल

आजकल

आजकल

नित नई इक कहानी कह रहे हैं आजकल,
सह रहे हैं दर्द कल के, पा सकें कुछ राज़ कल।

चाह कुछ भी नहीं अपनी सिवा इक हँसी,
राह जो चुनी हमने, गूँजेगी वो साज़ कल।

ज़ख़्म देना इस जहाँ की रीत है सदियों पुरानी,
मरहमों की आस रखना, छोड़ देना नाज़ कल।

कहते हैं मिटता इश्क़ का हर अक्स अब,
तू बने शाहजहाँ पहले, मिल सके मुमताज़ कल।

-कवि कुमार "प्रचंड"

 

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