विडंबना

विडंबना

जब ईमानदारी सम्मान नहीं, बल्कि तिरस्कार का कारण बन जाए; जब सच बोलने वाले कटघरे में खड़े हों और भ्रम को राष्ट्रभक्ति का नाम दिया जाने लगे—तब इतिहास, समाज और राजनीति की सबसे बड़ी विडंबनाएँ हमारे सामने खड़ी होती हैं।

विडंबना

ईमानदारी और तिरस्कार
दोनों अक्सर साथ चलते हैं।

शक है?
तो प्रयोग करके देखिए।

स्रोत है
शताब्दियों का इतिहास।

माफ कीजिए,
सोशल मीडिया अभी इस अनुभव से वंचित है।

हाँ, दैनिक जीवन से
कुछ मिसालें अवश्य दी जा सकती हैं।

मसलनस्त्रियाँ।

जितनी ईमानदार होती हैं घर में,
उतनी ही अधिक तिरस्कृत।

दादी की झुर्रियों में इसे पढ़ा जा सकता है,
माँ की व्यस्तताओं में देखा जा सकता है,
बहन के विक्षोभ में समझा जा सकता है,
पत्नी की दुविधाओं में महसूस किया जा सकता है।

इसमें साज़िश बौद्धिकता की भी है,
जो हत्या को देशभक्ति
और हत्यारे को देशभक्त बना देती है।

यह मिसरा तो आरंभ से चला रहा है
"
गोडसे और गांधी"

करोड़ों बेरोज़गार हैं
कोरोना की मार में,

लाखों डूबे हैं
बाढ़ के तिरस्कार में,

आप व्यस्त हैं
चीन और पाकिस्तान के युद्ध में,

और हम आश्वस्त हैं
मोर के संसार में।

गौतम झा

 

Stay Updated with InsightfulTake

Get insightful stories, politics, culture and analysis directly in your inbox.

Subscribe Now →

Leave a Comment