वक्त की दहलीज़ और एक अक्स
दस साल की गर्द में कितने ही मौसम बदल गए,
कितने ही ख़्वाब जागे और धूप में पिघल गए।
मगर आज जब रूबरू हुए, तो अचरज की एक लहर जगी,
तुम्हारे चेहरे पर वही पुरानी, इक पाकीज़ा-सी सहर जगी।
ये महज़ हुस्न नहीं, ये व्यक्तित्व का एक ठहराव है,
वक्त की आंधियों में भी, अपने अस्तित्व का अडिग प्रभाव है।
तुम्हारी आँखों की वो चपल चमक आज भी बेमिसाल है,
जैसे ठहरे हुए दरिया में भी, खामोशी का एक जलाल है।
एक मर्तबा फिर वही रफ़ाक़त याद आई है,
उन दफ़्तरों की भीगी-सी, कोई भूली इबादत याद आई है।
तुम आज भी वही सादा-से, मुकम्मल एक पन्ना हो,
जिसमें लिखी हर बात हसीं, और हर लफ़्ज़ अनकहा हो।
तारीफ़ क्या करूँ कि शब्दों का दायरा कम है,
तुम्हारी गरिमा के आगे, मेरी हर उपमा मद्धम है।
ये मुलाक़ात महज़ यादों का पुनरुद्धार नहीं,
तुम वो आईना हो, जिसमें वक्त का भी कोई अधिकार नहीं।
गौतम झा