क्या सचमुच समय बदल गया है, या बदलते समय के साथ इंसान ने अपनी संवेदनाएँ खो दी हैं? यह कविता उसी सवाल का आईना है।
समय क्या बकवास है?
राम-रहीम की धरती पर,
मानवता की जड़ता पर,
घर-घर फैल रहा है बैर,
अब किसकी होगी खैर?
अँधियारा है चारों ओर,
समय का चलता है बस ज़ोर।
हाथ जोड़ सब भक्ति करते,
मंदिर-मस्जिद की युक्ति धरते,
मन में पलता क्षोभ और लोभ,
समय बना है उसका स्रोत।
सच के हक़दार हैं सभी,
झूठ मगर असरदार अभी।
अशांति ही जीवन का भोग,
समय बना उसका उपभोग।
हवा हुई है कुपोषित,
देखो गंगा भी दूषित।
हिमालय चुपचाप पिघल रहा,
समय भी रंग बदल रहा।
चाँद तलक पहुँचना मंज़ूर,
मंगल अब भी लगता दूर।
बुध को अपने ज्ञान का गुरूर,
शुक्र वैभव से भरपूर।
शनि मौन है, न सहयोग है,
रवि भी जैसे संयोग है।
उपहास ही अब रास है,
क्या यही समय की प्यास है?
या फिर हमारी सोच ही,
सबसे बड़ी बकवास है?
– गौतम झा
समय क्या बकवास है?
राम-रहीम की धरती पर,
मानवता की जड़ता पर,
घर-घर फैल रहा है बैर,
अब किसकी होगी खैर?
अँधियारा है चारों ओर,
समय का चलता है बस ज़ोर।
हाथ जोड़ सब भक्ति करते,
मंदिर-मस्जिद की युक्ति धरते,
मन में पलता क्षोभ और लोभ,
समय बना है उसका स्रोत।
सच के हक़दार हैं सभी,
झूठ मगर असरदार अभी।
अशांति ही जीवन का भोग,
समय बना उसका उपभोग।
हवा हुई है कुपोषित,
देखो गंगा भी दूषित।
हिमालय चुपचाप पिघल रहा,
समय भी रंग बदल रहा।
चाँद तलक पहुँचना मंज़ूर,
मंगल अब भी लगता दूर।
बुध को अपने ज्ञान का गुरूर,
शुक्र वैभव से भरपूर।
शनि मौन है, न सहयोग है,
रवि भी जैसे संयोग है।
उपहास ही अब रास है,
क्या यही समय की प्यास है?
या फिर हमारी सोच ही,
सबसे बड़ी बकवास है?
– गौतम झा
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