बैसाखी सिर्फ उत्सव नहीं, किसान के पसीने से लिखी देश की सबसे सुंदर कविता है।
बैसाखी
स्वर्ण-शिखाओं के आँगन में, जब काल-चक्र मुड़ जाता है
तब कृषक के स्वेद-कणों से, भाग्य देश का जुड़ जाता है।
नील गगन की चादर ओढ़े, रवि ने स्वर्ण बिखेरा है,
तजकर शीत का धूसर साया, नव-प्रभात का घेरा है।
रवींद्र की उन कविताओं सा, तरु-पल्लव आज थिरकते हैं,
जैसे सुप्त चेतना के सोपान, धीरे-धीरे सरकते हैं।
आम्र-मंजरी की मादकता, पवन संग जब बहती है,
वसुधा अपनी सजल आँखों से, हर्ष-कथा यह कहती है।
यह मात्र उत्सव नहीं फसल का, यह 'आनंदमठ' की वाणी है,
जिस माटी को लहू दिया, वह बनी आज कल्याणी है।
बंकिम के उन शंखनाद सा, गेहूँ का यह लहराना,
मानो परतंत्रता की बेड़ियाँ तोड़, विजय-गीत का गाना।
दशम गुरु की वह पुकार, जो पंच-नद में गूँजी थी,
खालसा की वह अमर ज्योति, भारत की पावन पूँजी थी।
शिथिल भुजाएँ फड़क उठीं, फिर शौर्य का नूतन भान हुआ,
बैसाखी के इस पावन तट पर, मानवता का उत्थान हुआ।
पके हुए उन स्वर्ण-खेतों में, जब दरांती चलती है,
तब सभ्यता की धमनियों में, नई रक्त-धार पलती है।
छोड़ो विषाद की जीर्ण कथाएँ, नूतन संवत् आया है,
तप-साधना की परिणति देखो, खेतों में मुस्काया है।
हर दाना एक मंत्र बना है, हर बाली एक साधना,
यह संन्यास नहीं, यह कर्मयोग की पावनतम आराधना।
उठो हे भारत के पुत्रों! तुम बैसाखी की धूप बनो,
अंधकार को निगल सको जो, उस शिव का तुम रूप बनो।
प्रकृति और पुरुष का यह मिलन, एक नया इतिहास लिखे,
जहाँ दरिद्रता शेष न हो, बस श्रम का ही विश्वास दिखे।
तव मस्तक पर तिलक लगाती, धूल तुम्हारी माटी की,
जय हो इस ऋतु-राज पर्व की, जय हो इस परिपाटी की!
— गौतम झा
बैसाखी
स्वर्ण-शिखाओं के आँगन में, जब काल-चक्र मुड़ जाता है
तब कृषक के स्वेद-कणों से, भाग्य देश का जुड़ जाता है।
नील गगन की चादर ओढ़े, रवि ने स्वर्ण बिखेरा है,
तजकर शीत का धूसर साया, नव-प्रभात का घेरा है।
रवींद्र की उन कविताओं सा, तरु-पल्लव आज थिरकते हैं,
जैसे सुप्त चेतना के सोपान, धीरे-धीरे सरकते हैं।
आम्र-मंजरी की मादकता, पवन संग जब बहती है,
वसुधा अपनी सजल आँखों से, हर्ष-कथा यह कहती है।
यह मात्र उत्सव नहीं फसल का, यह 'आनंदमठ' की वाणी है,
जिस माटी को लहू दिया, वह बनी आज कल्याणी है।
बंकिम के उन शंखनाद सा, गेहूँ का यह लहराना,
मानो परतंत्रता की बेड़ियाँ तोड़, विजय-गीत का गाना।
दशम गुरु की वह पुकार, जो पंच-नद में गूँजी थी,
खालसा की वह अमर ज्योति, भारत की पावन पूँजी थी।
शिथिल भुजाएँ फड़क उठीं, फिर शौर्य का नूतन भान हुआ,
बैसाखी के इस पावन तट पर, मानवता का उत्थान हुआ।
पके हुए उन स्वर्ण-खेतों में, जब दरांती चलती है,
तब सभ्यता की धमनियों में, नई रक्त-धार पलती है।
छोड़ो विषाद की जीर्ण कथाएँ, नूतन संवत् आया है,
तप-साधना की परिणति देखो, खेतों में मुस्काया है।
हर दाना एक मंत्र बना है, हर बाली एक साधना,
यह संन्यास नहीं, यह कर्मयोग की पावनतम आराधना।
उठो हे भारत के पुत्रों! तुम बैसाखी की धूप बनो,
अंधकार को निगल सको जो, उस शिव का तुम रूप बनो।
प्रकृति और पुरुष का यह मिलन, एक नया इतिहास लिखे,
जहाँ दरिद्रता शेष न हो, बस श्रम का ही विश्वास दिखे।
तव मस्तक पर तिलक लगाती, धूल तुम्हारी माटी की,
जय हो इस ऋतु-राज पर्व की, जय हो इस परिपाटी की!
— गौतम झा