नव भारत का उदय
छोड़ो रूढ़ियों की बेड़ियाँ, अब समता का उजियारा है,
जिसने बदला भारत का भाग्य, वह भीमराव हमारा है।
सिर्फ किताबी शब्द नहीं, यह जीवन की परिभाषा है,
दलित, शोषित और वंचितों की, तुम ही अंतिम आशा है।
शिक्षित बनो, संगठित रहो—यह मंत्र दिया महामानव ने,
अंधकार से लड़ना सिखाया, साहस भरा हर मानव में।
कलम की ताकत से तुमने, सदियों का इतिहास लिखा,
जहाँ मनुष्य ही मनुष्य रहे, वह समरसता का मार्ग दिखा।
तुमने नारी के पैरों से, दासी की जंजीरें काटीं,
हिंदू कोड बिल के माध्यम से, न्याय की खुशियाँ बाँटीं।
शिक्षा और संपत्ति में, जब मिला उन्हें अधिकार,
तब जाकर सच में हुआ, भारत माँ का श्रृंगार।
तुमने ही सींचा है हमको, श्रम और न्याय के पानी से,
मजदूरों के हक सुरक्षित, तुम्हारी ही मेहरबानी से।
आठ घंटों की कार्य-अवधि, और सम्मान का वादा है,
तुम्हारी दूरदृष्टि का ही, यह सारा फल साकार हुआ है
रिजर्व बैंक की नींव बनी, तुम्हारी ही बुद्धिमत्ता से,
अर्थव्यवस्था को बल मिला, तुम्हारी ही विद्वत्ता से।
संविधान के रूप में जो, तुमने हमें वरदान दिया,
उसने ही हर नागरिक को, जीने का सम्मान दिया।
तव चरणों की धूल लगाती, मस्तक को पावन करती,
धन्य हुई है देख तुम्हें, यह वीरों की भारत धरती।
जय हो उस जन-नायक की, जय हो उस प्रज्ञा-सूर्य की,
जय हो भारत के भाग्य-विधाता, बाबा साहेब भीम की!
— गौतम झा