हवा पर नाम

हवा पर नाम

कुछ रिश्ते इज़हार नहीं माँगते, बस एक स्वीकार की प्रतीक्षा करते हैं। "हवा पर नाम" उन अनकहे एहसासों की कविता है, जहाँ नज़र, इंतज़ार और मिलन की चाह शब्दों से अधिक बोलती है।

हवा पर नाम

कभी अनकहे रिश्तों की क़दर करो,
सामने रहकर कुछ असर करो।

समझ में आए ऐसी पहल करो,
इसमें नज़र का भी दख़ल करो।

दुविधा की दीवार गिरा दो,
सामने आकर मुस्कुरा दो।

महज़ ये इत्तेफ़ाक़ मिटा दो,
रोज़-रोज़ की बात बना दो।

मिलन को महताब बना दो,
उसके नीचे ख़्वाब सजा दो।

सुबह से शाम कर दो,
दिन को गुमनाम कर दो।

स्वीकार की शर्त बता दो,
हवा पर नाम लिखा दो।

गौतम झा

 

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