निस्तब्धता की दीक्षा
वह मुस्कान संदिग्ध है
जिसमें पीड़ा का कोई सूक्ष्म कंपन नहीं,
वह चेहरा भी अपूर्ण—
जिसकी स्मृति में कोई धुंधला स्पर्श नहीं ठहरता।
जो भीड़ की चमक में स्वयं को विलीन कर देते हैं,
वे कहाँ जान पाते हैं—
एकांत भी साधना का ही दूसरा नाम है।
जब कमरा अपनी ही साँसों में सिमट आता है,
और दीपक की लौ थककर धीमे-धीमे डोलती है,
तभी अतीत,
अदृश्य अतिथि-सा,
शिरहाने आकर चुपचाप बैठ जाता है।
विरह का वह गहन विराम—
नादहीन, किन्तु असह्य—
मानो हृदय की शिला पर
किसी अनकहे शब्द की धार उतरती हो।
जो लोग रातों को आँसुओं में भिगोकर बिताते हैं,
वही जीवन के गूढ़तम रस के सहभागी होते हैं।
भीगी पलकों के उस पार जो दृश्य आकार लेता है,
वह हँसी के असंख्य आवरणों से अधिक प्रामाणिक होता है।
दुनिया इसे दुर्बलता का चिह्न कहती है,
पर यह तो आत्मा की निर्मलता का संस्कार है—
एक ऐसी दीक्षा,
जहाँ हर आँसू
अंतर की किसी अशुद्धि को बहा ले जाता है।
जिसने वियोग की ज्वाला को
अपने भीतर नहीं उतारा,
उसने प्रेम की पराकाष्ठा को
केवल सुना है, जिया नहीं।
शुष्क नेत्रों को क्या ज्ञात—
वह विरल शांति,
जो रुद्ध सिसकियों के पश्चात
धीरे से हृदय में उतरती है।
इन मौन आँसुओं के पीछे
एक अथाह सागर थिरकता है—
जिसकी एक लहर पर
उत्सवों की समूची चकाचौंध
निरर्थक प्रतीत होती है।
— गौतम झा