नवयुग की नारी
मार्च 2026 की सुबह में
जब दुनिया अपनी दिशा खोज रही है,
भारत की बेटियाँ
समय के आकाश पर
नई रोशनी लिख रही हैं।
वे अब केवल कथाओं की नायिका नहीं,
वे इतिहास की लेखिका हैं—
अपने कर्म से,
अपने साहस से,
और अपने स्वप्नों से।
बेंगलुरु की प्रयोगशालाओं में
कोड की पंक्तियों के बीच
एक युवा स्त्री
भविष्य की कृत्रिम बुद्धिमत्ता गढ़ रही है।
श्रीहरिकोटा के आकाश में
जब रॉकेट अग्नि की तरह उठता है,
तो उसके पीछे
किसी भारतीय महिला वैज्ञानिक की
शांत, धैर्यभरी दृष्टि होती है।
सीमा पर
एक महिला अधिकारी
हिमालय की ठंडी हवा में
देश की सुरक्षा का संकल्प लिखती है।
खेल के मैदानों में
पसीने की चमक से
भारत का तिरंगा ऊँचा होता है—
जहाँ बेटियाँ
हार को भी
एक नए साहस में बदल देती हैं।
संसद के गंभीर कक्षों में
अब नारी की आवाज
केवल प्रतिध्वनि नहीं,
निर्णय की शक्ति बन रही है।
गाँव की मिट्टी में भी
एक परिवर्तन अंकुरित हो रहा है—
जहाँ स्व-सहायता समूहों की महिलाएँ
अपनी मेहनत से
परिवार ही नहीं,
पूरा समाज बदल रही हैं।
दुनिया आज देख रही है
कि भारत की नारी
परंपरा को त्याग नहीं रही,
बल्कि उसे
नए युग की रोशनी में
फिर से रच रही है।
उसकी उड़ान
सिर्फ अधिकारों की लड़ाई नहीं,
यह सृजन की यात्रा है—
जहाँ विज्ञान, शिक्षा,
कला और नेतृत्व
सब उसके पथ के साथी हैं।
और जब इतिहास
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक को पढ़ेगा,
तो वह लिखेगा—
कि भारत की स्त्रियों ने
केवल अपने सपनों को नहीं जगाया,
उन्होंने पूरे विश्व को बताया
कि शक्ति और करुणा
जब एक साथ चलती हैं,
तो मानवता
एक नए युग में प्रवेश करती है।
यही है
नवभारत की नारी—
जो सीमाएँ नहीं पूछती,
आकाश चुनती है।
— गौतम झा
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